1935 के बाद 103 साल बाद फिर आएगा सात ग्रहणों का दुर्लभ रिकॉर्ड! क्या होगा 2038 में? : वर्ष 1982 के बाद एक वर्ष में तीन ब्लड मून पूर्ण चन्द्र ग्रहण की घटना अब वर्ष 2485 में
राहुल कुमार गुप्ता
लखनऊ : ग्रहण सिर्फ एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि ब्रह्मांड का एक रहस्यमयी नाटक है। जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीधी कतार में आ जाते हैं, तो छाया का यह खेल हमें चकित कर देता है। सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा सूर्य की रोशनी को रोक लेता है, और चंद्र ग्रहण तब जब पृथ्वी अपनी छाया से चंद्रमा को ढक लेती है। यह रोशनी-छाया का खेल इतना सटीक होता है कि यह सदियों में खुद को दोहराता है।
बता दें कि खगोल विज्ञान बताता है कि एक साल में ग्रहणों की अधिकतम संख्या 7 तक हो सकती है खगोलशास्त्र के जानकारों का मानना है कि यह ‘महासंयोग’ तब बनता है जब ग्रहणों का मौसम साल की शुरुआत और अंत दोनों में खुल जाता है। इतिहास में ऐसे साल बहुत कम आए हैं। आखिरी बार 1982 में ऐसा हुआ था, और उससे पहले 1935 में।
एक अध्ययन के अनुसार 1935 में कुल 7 ग्रहण पड़े थे जिसमे 5 सूर्य ग्रहण (ज्यादातर आंशिक) और 2 चंद्र ग्रहण (दोनों पूर्ण)। वहीं 1982 में संतुलन अलग था। 4 सूर्य ग्रहण और 3 पूर्ण चंद्र ग्रहण (ब्लड मून)। तीन पूर्ण चंद्र ग्रहण एक ही साल में होना बेहद दुर्लभ है, क्योंकि आमतौर पर साल में सिर्फ दो चंद्र ग्रहण होते हैं। 1982 में यह जादू 9 जनवरी, 6 जुलाई और 30 दिसंबर को हुआ था, जब चंद्रमा लाल रंग में नहाया था।
अब अगला ऐसा तीन ब्लड मून वाला साल? खगोलीय गणनाओं के मुताबिक, यह संयोग अब 2485 में दोबारा बनेगा। यानी हमें सैकड़ों साल इंतजार करना होगा!
लेकिन अच्छी खबर यह है कि सात ग्रहणों वाला महासंयोग ज्यादा दूर नहीं। 1982 के बाद अगली बार यह 2038 में आएगा, और फिर 2094 में। यानी आने वाली पीढ़ियां इसे देख सकेंगी।
माना जाता है कि यह महज संख्याएं नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की लय हैं। वैज्ञानिक इसे गणित और गति का खेल मानते हैं, लेकिन ज्योतिष और पौराणिक मान्यताओं में इन ग्रहणों को बड़े बदलावों का संकेत माना जाता है।
1935 में इतने सूर्य ग्रहणों को वैश्विक सत्ता के हिलने-डुलने से जोड़ा गया। उसी दौर में हिटलर की ताकत चरम पर पहुंची, इटली ने इथियोपिया पर हमला किया। द्वितीय विश्व युद्ध की नींव पड़ी। सूर्य को ‘राजा’ या सत्ता का प्रतीक मानकर ज्योतिषी इसे ईश्वरीय संरक्षण के कम होने का संकेत बताते थे।
1982 में तीन ब्लड मून और कुल सात ग्रहणों को जनता की बेचैनी और संघर्ष से जोड़ा गया। फॉकलैंड युद्ध छिड़ा, लेबनान में हिंसा बढ़ी, शीत युद्ध का तनाव चरम पर था। ब्लड मून को पुराने युग के अंत और नए संघर्ष की शुरुआत माना जाता है। उसी साल ग्रहों का ग्रैंड अलाइनमेंट भी हुआ था, जिसे ‘जुपिटर इफेक्ट’ कहा गया। यह हर 176-180 साल में होता है, अगला लगभग 2161 में आएगा।
वैज्ञानिक कहते हैं कि ग्रहणों का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता, लेकिन इतिहास दिखाता है कि जब आसमान में छाया सात बार खेलती है, तो धरती पर भी सत्ता, समाज और इतिहास में उथल-पुथल मच जाती है।
अब सोचने वाली बात यह है कि क्या 2038 में फिर कुछ ऐसा ही होगा? यह तो समय ही बताएगा। फिलहाल, यह ब्रह्मांड हमें याद दिलाता है कि हर अंधेरे के बाद रोशनी है, और हर छाया के पीछे एक नई सुबह छिपी है।







