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    Home»ज़रा हटके

    लखनऊ के खास मंदिर और झीलों की मिटती निशानियां

    ShagunBy ShagunMay 26, 2025Updated:May 26, 2025 ज़रा हटके No Comments6 Mins Read
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    Post Views: 693

    लखनऊ, नवाबों का शहर, अपनी ऐतिहासिक विरासत, स्वादिष्ट व्यंजनों और शैक्षिक केंद्र के रूप में जाना जाता है। यह शहर अपनी सांस्कृतिक समृद्धि, इमामबाड़ों, कबाबों और प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन इसके साथ ही, लखनऊ की झीलें और मंदिर, जो कभी इसकी शोभा बढ़ाते थे, अब उपेक्षा और भूमि माफिया के कब्जे का शिकार हो रहे हैं। यहाँ लगभग 100 मंदिर हैं, जिनमें से कई के साथ प्राचीन झीलें या तालाब जुड़े हुए थे, जो अब या तो वीरान हो चुके हैं या अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए हैं। आज हम इस लेख में लखनऊ के मंदिरों और झीलों के रहस्यों को और गहराई से देखेंगे, साथ ही वर्तमान स्थिति और संरक्षण के प्रयासों पर भी प्रकाश डालेंगे।

    लखनऊ न केवल अपने नवाबी ठाठ-बाट और भोजन जैसे बिरयानी, कबाब और तंदूरी व्यंजनों के लिए जाना जाता है, बल्कि यह शिक्षा का भी प्रमुख केंद्र है। यहाँ सात विश्वविद्यालय, 38 तकनीकी कॉलेज, पांच मेडिकल कॉलेज और कई अन्य शैक्षिक संस्थान हैं। लेकिन इस आधुनिकता के बीच, शहर के प्राचीन मंदिर और झीलें अपनी कहानी कहते हैं, जो अब वीरानी और उपेक्षा की चपेट में हैं।

    चंद्रिका देवी मंदिर

    गोमती नदी के तट पर बसे चंद्रिका देवी मंदिर को लखनऊ के सबसे पुराने और पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना भगवान राम के भाई लक्ष्मण के पुत्र द्वारा की गई थी। यह मंदिर अपनी दिव्य आभा और आध्यात्मिक शक्ति के लिए जाना जाता है। पहले गोमती नदी की निर्मल धारा इस मंदिर की शोभा बढ़ाती थी, लेकिन अब नदी का प्रदूषण और मंदिर परिसर की उपेक्षा निराशाजनक है। हाल के वर्षों में, स्थानीय प्रशासन ने मंदिर के जीर्णोद्धार और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रयास शुरू किए हैं। नियमित मेलों और धार्मिक आयोजनों ने इस मंदिर को फिर से जीवंत किया है। 2024 में, उत्तर प्रदेश सरकार ने गोमती नदी की सफाई और मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण के लिए नई योजनाएँ शुरू की हैं, जिससे पर्यटकों और श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि हुई है।

    मनकामेश्वर मंदिर

    लखनऊ का मनकामेश्वर मंदिर, भगवान शिव को समर्पित, लगभग 1,000 साल पुराना है। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि भारतीय इतिहास और स्थापत्य कला का भी प्रतीक है। मंदिर का परिसर शांत और आध्यात्मिक वातावरण प्रदान करता है। यहाँ का प्राचीन शिवलिंग और 11 रुद्र मूर्तियों से सजा मंदिर परिसर हिंदू वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके पास ही 1860 में निर्मित काशी ईश्वर महादेव मंदिर भी है, जो अपनी पारंपरिक वास्तुकला के लिए जाना जाता है। हालाँकि, मंदिरों के आसपास की भूमि पर अतिक्रमण और रखरखाव की कमी ने इनके सौंदर्य को प्रभावित किया है। हाल के दिनों में, स्थानीय समुदाय और स्वयंसेवी संगठनों ने इन मंदिरों के संरक्षण के लिए जागरूकता अभियान शुरू किए हैं, जिससे कुछ सुधार देखने को मिला है।

    बड़ी काली जी मंदिर

    Motijheel, Aishbagh

    चौक क्षेत्र में स्थित बड़ी काली जी मंदिर अपनी अनूठी विशेषता के लिए प्रसिद्ध है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण आदि शंकराचार्य ने लगभग 2,000 साल पहले करवाया था। यह भारत का एकमात्र मंदिर है, जहाँ भगवान विष्णु और माँ काली की मूर्तियाँ एक साथ पूजी जाती हैं। मंदिर में अष्टधातु की प्राचीन मूर्ति, जो अर्धनारीश्वर स्वरूप में है, केवल नवरात्रि की अष्टमी और नवमी के दौरान दर्शन के लिए उपलब्ध होती है। इस मूर्ति के सामने माँगी गई मन्नतों के पूरी होने की मान्यता है। मंदिर का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व इसे श्रद्धालुओं के लिए विशेष बनाता है। हालाँकि, मंदिर के आसपास की भीड़ और अव्यवस्था इसके प्राचीन स्वरूप को प्रभावित करती है। 2025 में, स्थानीय प्रशासन ने मंदिर परिसर को व्यवस्थित करने और पार्किंग सुविधाएँ विकसित करने की योजना बनाई है, ताकि श्रद्धालुओं को बेहतर अनुभव मिले।

    झीलों का विनाश

    लखनऊ की झीलें और तालाब, जो कभी इस शहर की शोभा और पारिस्थितिकी का आधार थे, अब भूमि माफिया और उपेक्षा के कारण वीरान हो चुके हैं। मोहनलालगंज के पास चेन्नई खड़े, सलोना, शिवधारा गाँवों को जोड़ने वाली चैडवक या करेला झील कभी 12 गाँवों की जीवनरेखा थी। इस झील में कमल के फूल खिलते थे, लेकिन अब यह अतिक्रमण और कूड़े से भर चुकी है। इसी तरह, मुदियार तालाब, जो इस झील से जुड़ा था, अब पूरी तरह सूख चुका है। लखनऊ-रायबरेली रोड पर मोहनलालगंज में एक प्राचीन कुआँ था, जिसके पानी के कभी न सूखने की मान्यता थी, लेकिन अब यह कूड़े से भरकर नष्ट हो चुका है।

    किशनपुर-परसैया के पास 6 किलोमीटर लंबी सौतन झील, जो गर्मियों में भी पानी से भरी रहती थी, अब सूखी और उजाड़ है। सरकार ने इस झील को पक्षी विहार बनाने की योजना बनाई थी, लेकिन यह योजना अधूरी रह गई। बटवारा के पास 289 बीघा की एक और झील, जिसमें जमीन से पानी निकलता था, अब केवल बरसाती पानी पर निर्भर है। बख्शी का तालाब तहसील में आदमपुर उर्सना गाँव के पास 350 बीघा की सौतेली झील पर अब खेती हो रही है। इन झीलों का विनाश न केवल पर्यावरणीय क्षति है, बल्कि लखनऊ की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का भी ह्रास है।

    वर्तमान प्रयास और चुनौतियाँ

    हाल के वर्षों में, उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय संगठनों ने लखनऊ की झीलों और मंदिरों के संरक्षण के लिए कुछ कदम उठाए हैं। गोमती नदी की सफाई, मंदिर परिसरों का सौंदर्यीकरण और झीलों को पुनर्जनन की योजनाएँ शुरू की गई हैं। 2024 में, लखनऊ नगर निगम ने कुछ झीलों को पुनर्जनन के लिए चिह्नित किया और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू की। लेकिन भूमि माफिया, स्थानीय भ्रष्टाचार और जनजागरूकता की कमी इन प्रयासों को बाधित कर रही है। पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि इन झीलों को जल्दी नहीं बचाया गया, तो लखनऊ की पारिस्थितिकी और जल संकट गहरा सकता है।

    लखनऊ के मंदिर और झीलें इस शहर की आत्मा हैं, जो इसके प्राचीन इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाते हैं। चंद्रिका देवी, मनकामेश्वर और बड़ी काली जी मंदिर जैसे स्थल न केवल आध्यात्मिक केंद्र हैं, बल्कि भारतीय स्थापत्य और परंपराओं के प्रतीक भी हैं। दूसरी ओर, शहर की झीलें, जो कभी जीवन और प्रकृति का आधार थीं, अब वीरान पड़ी हैं। इन धरोहरों को बचाने के लिए सरकार, स्थानीय समुदाय और पर्यटकों को मिलकर काम करना होगा। लखनऊ की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि प्रगति के साथ-साथ अपनी विरासत को संजोना भी उतना ही जरूरी है। – प्रस्तुति : नीतू सिंह

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