इस बार महाशिवरात्रि 15 फरवरी को, मंदिरों में तैयारियां अभी से : महाशिवरात्रि की सबसे प्रसिद्ध और पौराणिक कथा शिव पुराण से ली गई है-
प्रस्तुति : नीतू सिंह
बहुत पुराने समय की बात है। एक जंगल के पास एक शिकारी रहता था, जिसका नाम चित्रभानु था। वह रोज जंगली जानवरों का शिकार करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। एक बार उसने एक साहूकार से कर्ज लिया था, लेकिन समय पर लौटा नहीं पाया। गुस्से में साहूकार ने उसे पकड़वा लिया और शिव मंदिर (शिवमठ) में बंदी बना दिया।
संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। मंदिर में शिव की पूजा हो रही थी और लोग शिवरात्रि व्रत की कथा सुना रहे थे। बंदी होने के कारण चित्रभानु भी सारी बातें ध्यान से सुनता रहा। शाम को साहूकार ने उसे बुलाया और कहा – “कल तक पूरा कर्ज लौटा दो, नहीं तो…” चित्रभानु ने वादा किया कि कल सुबह तक सब चुकता कर देगा। फिर वह घर की ओर चल पड़ा।
लेकिन घर लौटते-लौटते रात हो गई। उसे पूरे दिन कुछ नहीं मिला था, परिवार भूखा था। वह बहुत चिंतित था। रात में वह एक तालाब के किनारे पहुंचा। वहाँ एक बेल का पेड़ था और उसी पेड़ के नीचे एक शिवलिंग था, जो सूखे बेलपत्रों से ढका हुआ था, इसलिए दिखाई नहीं दे रहा था।
शिकारी ने सोचा – “रात भर यहीं चढ़कर बैठता हूँ, कोई जानवर पानी पीने आएगा तो शिकार कर लूँगा।” वह पेड़ पर चढ़ गया और धनुष-बाण लेकर इंतजार करने लगा।
रात के चार पहर में क्या हुआ:
पहला पहर: एक हिरणी पानी पीने आई। शिकारी ने तीर साधा, लेकिन हाथ हिलने से कुछ बेलपत्र और पानी की बूँदें नीचे शिवलिंग पर गिर गईं। अनजाने में उसकी पहली पूजा हो गई। हिरणी ने कहा – “मुझे मत मारो, मैं गर्भवती हूँ। अपने बच्चों को छोड़कर आऊँगी।” शिकारी ने पहले तो मना किया, लेकिन हिरणी ने सत्य की शपथ ली। दया आ गई और उसने उसे जाने दिया।
दूसरा पहर: थोड़ी देर बाद दूसरी हिरणी आई। फिर वही हुआ – तीर साधते समय बेलपत्र और जल शिवलिंग पर गिरे। दूसरी पूजा हो गई। इस हिरणी ने भी वचन दिया कि वह लौट आएगी। शिकारी ने उसे भी जाने दिया।
तीसरा पहर: अब हिरणी के बच्चे आए। फिर वही क्रम दोहराया गया – बेलपत्र गिरे, तीसरी पूजा हो गई। बच्चे भी वचन देकर लौट आए।
चौथा पहर: आखिर में हिरणी का पति (हिरन) आया। शिकारी ने सोचा अब तो शिकार पक्का। लेकिन फिर बेलपत्र गिरे, चौथी पूजा पूरी हुई। हिरन ने भी सत्य का वचन दिया और जाने की इजाजत मांगी।
पूरी रात शिकारी जागता रहा, भूखा-प्यासा रहा, लेकिन किसी का भी शिकार नहीं किया। सुबह होते ही सारे जानवर अपने वचन निभाने लौट आए। शिकारी को बहुत पछतावा हुआ। उसने सोचा – “इन जीवों ने अपना वचन निभाया, मैंने इतने पाप किए हैं।” उसने शिकार छोड़ दिया और सारे जानवरों को जाने दिया।
उसी दिन से चित्रभानु ने पाप छोड़ दिए और भगवान शिव की भक्ति में लग गया। मरने के बाद उसे शिवलोक की प्राप्ति हुई।
भगवान शिव ने माता पार्वती को बताया कि “जो अनजाने में भी शिवरात्रि की रात जागरण, बेलपत्र अर्पण और व्रत करता है, उसे भी मैं मोक्ष देता हूँ।”
महाशिवरात्रि का संदेश
यह कथा बताती है कि भगवान शिव कितने दयालु हैं। थोड़ी-सी भी सच्ची भक्ति, जागरण और बेलपत्र चढ़ाने से वे प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए महाशिवरात्रि पर व्रत रखें, रात भर जागें, “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें और बेलपत्र चढ़ाएं।
हर हर महादेव!







