सुशील कुमार
महाराष्ट्र सरकार का निजी क्षेत्र में कार्य घंटे 9 से बढ़ाकर 10 करने का प्रस्ताव, जो महाराष्ट्र शॉप्स एंड एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट, 2017 के तहत लागू होने की योजना है, कर्मचारी कल्याण को नजरअंदाज करने वाला एक प्रतिगामी कदम है। यह धारणा कि अधिक घंटे काम करने से उत्पादकता बढ़ेगी, वैज्ञानिक रूप से गलत और पुरातन है। आधुनिक अध्ययन और वैश्विक उदाहरण साबित करते हैं कि लंबे कार्य घंटे कर्मचारियों के स्वास्थ्य, रचनात्मकता और कार्यक्षमता को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था और समाज पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव
लंबे कार्य घंटे उत्पादकता को बढ़ाने के बजाय कम करते हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के 2023 के एक अध्ययन के अनुसार, प्रति सप्ताह 40 घंटे से अधिक काम करने पर थकान और तनाव के कारण त्रुटि दर 22% तक बढ़ जाती है और रचनात्मकता में 18% की कमी आती है। महाराष्ट्र में वर्तमान 9 घंटे की दैनिक कार्य अवधि (साप्ताहिक 54 घंटे) पहले ही वैश्विक मानकों से अधिक है। इसे 10 घंटे (60 घंटे साप्ताहिक) करने से कर्मचारियों पर शारीरिक-मानसिक दबाव बढ़ेगा, जिससे बर्नआउट, स्वास्थ्य समस्याएं और कार्य-जीवन संतुलन में कमी आएगी। क्या सरकार ने दीर्घकालिक कार्यक्षमता पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किया है?
मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर खतरा
लंबे कार्य घंटों का मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और आईएलओ के 2024 के एक संयुक्त अध्ययन के अनुसार, लंबे कार्य घंटों के कारण वैश्विक स्तर पर प्रतिवर्ष 8 लाख से अधिक लोग हृदय रोग और स्ट्रोक से मरते हैं, जो 2000 की तुलना में 33% अधिक है। भारत में, जहां पहले ही 62% कर्मचारी कार्यस्थल तनाव से जूझ रहे हैं (2024 सर्वेक्षण), यह प्रस्ताव स्थिति को और खराब करेगा। महाराष्ट्र जैसे औद्योगिक केंद्र में, जहां लाखों लोग निजी क्षेत्र में काम करते हैं, क्या सरकार इस स्वास्थ्य संकट को अनदेखा कर सकती है?
महिलाओं की सुरक्षा पर भी सवाल

प्रस्ताव में नाइट शिफ्ट में महिलाओं को शामिल करने का प्रावधान लैंगिक समानता के नाम पर स्वागत योग्य लग सकता है, लेकिन यह सुरक्षा और सुविधाओं के अभाव में जोखिम भरा है। 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, केवल 20% महिलाएं नाइट शिफ्ट को सुरक्षित मानती हैं, और अधिकांश ने परिवहन व कार्यस्थल सुरक्षा की कमी की शिकायत की। बिना मजबूत सुरक्षा ढांचे, जैसे अनिवार्य पिकअप-ड्रॉप सुविधाएं और सुरक्षित कार्यस्थल नीतियां, यह कदम महिलाओं को सशक्त बनाने के बजाय उन्हें खतरे में डाल सकता है। क्या सरकार ने इसके लिए कोई ठोस योजना बनाई है?
तकनीकी युग में पुरातन दृष्टिकोण
आज के तकनीकी युग में, उत्पादकता बढ़ाने के लिए लंबे कार्य घंटों पर निर्भरता अप्रासंगिक है। टेक्नोलॉजी और ऑटोमेशन से कार्यकुशलता कई गुना बढ़ाई जा सकती है। जापान में माइक्रोसॉफ्ट के 2023 के प्रयोग से चार दिन के कार्य सप्ताह ने उत्पादकता में 42% की वृद्धि दिखाई। फिनलैंड और न्यूजीलैंड जैसे देशों ने भी कम कार्य घंटों से बेहतर परिणाम हासिल किए हैं। महाराष्ट्र सरकार को ऐसे प्रगतिशील मॉडल अपनाने चाहिए, न कि पुराने और हानिकारक तरीकों पर निर्भर रहना चाहिए।
आर्थिक और सामाजिक जोखिम
लंबे कार्य घंटे कर्मचारियों की नौकरी से संतुष्टि को कम करते हैं, जिससे टर्नओवर दर बढ़ती है। 2025 के एक अध्ययन के अनुसार, असंतुष्ट कर्मचारी 35% अधिक संभावना से नौकरी छोड़ते हैं, जिससे कंपनियों को भर्ती लागत में 20-30% की वृद्धि झेलनी पड़ती है। महाराष्ट्र जैसे औद्योगिक केंद्र में कर्मचारी असंतोष से आर्थिक प्रतिस्पर्धा को झटका लग सकता है। साथ ही, यह प्रस्ताव सामाजिक असमानता को बढ़ाएगा, क्योंकि मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग के कर्मचारियों का पारिवारिक और निजी समय और अधिक सिकुड़ेगा, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ेगा।
ऑटोमेशन जैसे नवाचारों को बढ़ावा देना
महाराष्ट्र सरकार को इस प्रस्ताव पर तत्काल पुनर्विचार करना चाहिए। कर्मचारी कल्याण के लिए बेहतर वेतन, लचीले कार्य घंटे, स्वास्थ्य सुविधाएं और तकनीकी प्रशिक्षण पर निवेश जरूरी है। सरकार को चार दिन के कार्य सप्ताह, हाइब्रिड कार्य मॉडल और ऑटोमेशन जैसे नवाचारों को बढ़ावा देना चाहिए। यह न केवल कर्मचारियों की भलाई सुनिश्चित करेगा, बल्कि राज्य की आर्थिक और सामाजिक प्रगति को भी सुदृढ़ करेगा।
कर्मचारी किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उनकी उपेक्षा न केवल अन्याय है, बल्कि यह दीर्घकाल में राज्य के लिए एक भयावह भूल होगी। सरकार को पुरातन सोच को त्यागकर तकनीक और कल्याण आधारित नीतियों को अपनाना चाहिए, ताकि महाराष्ट्र प्रगति और समरसता का प्रतीक बन सके।







