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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    गुजरा हुआ जमाना आता नही दोबारा

    By February 17, 2020 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    जी के चक्रवर्ती

    दिल्ली चुनाव के बाद कांग्रेस का बेहद बुरा हाल है कांग्रेस अब जीरो से हीरो बनकर कब उबरेगी यह देखने वाली बात होगी। आज के समय मुझे इस लेख का शीर्षक यही उचित लगा था लेकिन हमे गुजरे हुये वक्त को लेकर चलना उचित लगा, क्योंकि यदि हम देश के इस राजनीतिक पार्टी के इतिहास को खंगाले तो भारतीय राजनीतिक इतिहास में 135 वर्ष पुरानी राजनीतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसंबर वर्ष 1885 को ब्रिटिश अधिकारी एओ ह्यूम, दादाभाई नैरोजी, दिनशॉ वाचा एवं वोमेश बनर्जी जैसे लोगों ने मिलकर की थी। देश मे एक वक्त कांग्रेस का हुआ करता था लेकिन आज वही कांग्रेस अर्श से फर्श पर क्यों है? इसके कारणों में शायद बहुत सारे कारण मौजूद होंगे लेकिन जो वजह मुख्य रूप से हमारे सामने है उसमे सबसे पहली बात तो यह है कि यह पार्टी परिवार वाद की शिकार हुई है वर्ष 1952 से वर्ष 2014 तक 16 आम चुनावों में कांग्रेस ने 7 में पूर्ण बहुमत से जीत कर सत्ता में आयी और 4 में सत्तारूढ़ गठबंधन का नेतृत्व किया। कुल 49 वर्षों तक लगातार वह केंद्र सरकार में सत्तासीन रही है।

    वर्ष 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस पार्टी दिशा एवं नेतृत्व विहीन पार्टी बनकर वर्ष 1997 तक चुपचाप पड़ी रही। राजीव गांधी के हत्या के बाद कांग्रेस के लोगों ने सोनिया गांधी के नाम को आगे बढ़ाना शुरू किया और वर्ष 1998 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने जाने से सोनिया गांधी के पार्टी में प्रवेश करते ही कांग्रेस पुनर्जीवित हो गयी। शायद यही परिवार वाद की करिश्माई कारणों में से एक था।

    दूसरी वजह में इस पार्टी में हमेशा कथनी और करनी में फर्ख रहा है तीसरी सबसे बड़ी वजह में इस पार्टी के अध्यक्ष के पद नेहरू और इन्दिरा गांधी के बाद से कोई भी ज्यादा दिनों तक संभाल नही पाया इसके कारणों में न जाकर मुख्य बात पर आते हुये यह कहना पड़ता है कि किसी भी  राजनीतिक पार्टी की पहचान उस पार्टी के एक प्रमुख व्यक्ति से बनती है और पार्टी के उस व्यक्तित्व के कीर्ति एवं नीतियों से पार्टी के बाकी के लोग की पहचान बनाने में सहयोगी होती है। लेकिन एक लम्बे समय से कांग्रेस की अध्यक्ष पद पर कभी सोनिया विराजमान रही तो कभी राहुल को इस पद का कार्यभार संभालने के लिये बैठाया गया अब फिर से एक बार 72 वर्षीय सोनिया गांधी को कांग्रेस पार्टी की कमान संभालने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। इसे एक बार थका हुआ फैसला माना जा सकता है लेकिन, शायद इस वक़्त कांग्रेस के लिए इससे बेहतर फैसला और कुछ हो भी नही सकता है, क्योंकि बदलते दौर में पार्टी का लगातार हार का कारण न जाने कौन-सी सत्ता के लिए कांग्रेस कार्यसमिति में अपने नेता के चुनाव को लेकर युवा बनाम बुजुर्ग का झगड़ा प्रारम्भ हुआ जिसके कारण कभी भी पार्टी में मतैक्य नहीं हो पाया और धीरे-धीरे कांग्रेस पार्टी जन-स्वीकार्यता में लगातार हाशिए पर आती चली गयी।

    इन सब के बावजूद पार्टी ने कभी भी इस बात पर चिंतन नही किया गया कि क्या बदलते राजनीतिक परिदृश्य में 135 साल पुरानी पार्टी अपनी उपयोगिता आखिरकार क्यों खोती चली जा रही है? इस तरह के कारणों को समझने के बाद उसी के अनुरूप अपने दल के नेतृत्व का चुनाव करना चाहिए था लेकिन उसके स्थान पर पार्टी के शासनकर्ताओं ने समाज की सोच को अपने लिये उपयोगी बनाने के स्थान पर उसे और हवा देने का काम करती रही और कांग्रेस का नेतृत्व यह सब चुपचाप देखता भी रहा और समाज में तार्किक एवं  वैज्ञानिक सोच विकसित करने की दिशा में कोशिश ही नहीं की गयी। आज के समय मे कांग्रेस पार्टी की कौन सी विचारधारा या नीतियां युवा वर्ग के युवाओं को प्रभावित करने में सक्षम है और किसी विशेष वर्ग का ठप्पा न लगा कर सर्व धर्म की बात करने वाली विचार धारा पैदा कर वैज्ञानिक एवं तार्किक सोच की ओर चलने की जरूरत है कांग्रेस का वह प्रतिबद्ध कैडर कहाँ है जो व्यापक समाज की संकुचित सोच को बदलने पाने में सक्षम हो।

    कांग्रेस क्या नेहरू और इन्दिरा जैसी नेतृत्व क्षमता वाली व्यक्तित्व पिछले 55 वर्षो में देश को दे पाई है? यह पार्टी पिछले समय मे इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के बाद से कोई भरोसेमंद नेतृत्व पैदा ही नहीं कर पायी है और जो आए भी वे केवल सत्ता से चिपके रहने वाले लोग ही थे। आज के वक्त पार्टी के आदर्शों, विचारधारा एवं नीतियों में आमूलचूल बदलाव लाकर संगठन में नए रक्त का संचार का प्रवाह सुचारु रख कर ही समाज के लोगों के मध्य अपनी पहचान बरकरार रखने से ही कामियाबी हासिल हो सकती है।

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