पुष्पा मिंज की संघर्ष भरी कहानी, जहां गरीबी ने टैलेंट को दी चुनौती
नई दिल्ली : पुष्पा मिंज, झारखंड की एक अंतरराष्ट्रीय पैरा थ्रोबॉल खिलाड़ी, जिन्होंने थाईलैंड, कंबोडिया और नेपाल में गोल्ड और सिल्वर मेडल जीतकर भारत का सिर गर्व से ऊंचा किया, आज रांची के कडरू ओवरब्रिज के नीचे सब्जी बेचने को मजबूर हैं। एक पैर से दिव्यांग और अनाथ होने के बावजूद, उनके हौसले ने उन्हें मैदान में चैंपियन बनाया, लेकिन आर्थिक तंगी और सरकारी समर्थन की कमी ने उनके सपनों पर ग्रहण लगा दिया। झारखंड की पुष्पा मिंज दरअसल गरीबी से उबर ही नहीं पा रहीं हैं वह पिछले बारह साल से एक झोपड़े में किराये पर रह रही हैं और हालात से लड़ रही हैं।

कर्ज में डूबा टैलेंट, फिर भी हार नहीं मानी
पुष्पा ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए यात्रा खर्च भी कर्ज लेकर वहन करना पड़ा। वे सरकार से नौकरी और आर्थिक सहायता की गुहार लगा रही हैं ताकि अपने खेल को फिर से उड़ान दे सकें और देश के लिए और पदक जीत सकें। फ़िलहाल एक अंतरराष्ट्रीय खिलाडी के हालात बहुत बुरे हैं परिवार में पुस्पा मिंज को मिलाकर चार बहन और तीन भाई हैं माँ बचपन में और पिता कोविड के दौरान सन 2020 में बीमारी के चलते इन सभी को छोड़कर चले गए।
समाज की आवाज: गरीबी और व्यवस्था पर सवाल
यूजर सैफ इलाहाबादी ने लिखा, “कभी-कभी किस्मत और गरीबी टैलेंट को खत्म करने पर मजबूर कर देती है।” वहीं, धर्मेंद्र सिंह ने तल्ख टिप्पणी की, “गरीबी और जाति व्यवस्था ने इस बेटी को सब्जी बेचने को मजबूर किया। एक गोल्ड मेडलिस्ट का यह हाल देखकर सरकार को शर्मिंदगी महसूस करनी चाहिए।”
एक उम्मीद की किरण
हाल ही में, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हस्तक्षेप के बाद पुष्पा को कुछ सहायता मिली है, लेकिन उनकी जंग अभी खत्म नहीं हुई। यह कहानी न केवल पुष्पा के संघर्ष की है, बल्कि उन तमाम खिलाड़ियों की है, जिनके टैलेंट को सही मौका और समर्थन चाहिए।







