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    नोएडा के श्रमिकों का दर्द: 10-13 हज़ार पर 12 घंटे की बंधुआ मजदूरी, अब हिंसा तक पहुंचा प्रदर्शन

    ShagunBy ShagunApril 13, 2026 संपादकीय No Comments3 Mins Read
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    The Plight of Noida's Workers: 12 Hours of Bonded Labor for ₹10,000–₹13,000—Protests Now Escalate to Violence
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    नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले हजारों कर्मचारियों का गुस्सा फूट पड़ा है। महीने के 9 से 13 हज़ार रुपये वेतन पर 10 से 12 घंटे (कुछ जगह 12 – 13 घंटे) काम करते हुए ये लोग बंधुआ मजदूरी से भी बदतर हालात झेल रहे हैं। पिछले 10 – 12 साल से वेतन में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई, जबकि घर का किराया, बच्चों की फीस, खाना-पीना, दवाइयाँ – सबकी कीमत आसमान छू रही है। अब उनकी मांग है – कम से कम 18 से 20 हज़ार रुपये मासिक वेतन और 8 घंटे की तय काम की समय-सीमा।

    कई दिनों से चल रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन अब हिंसक रूप ले चुके हैं। कर्मचारी सड़कों पर उतर आए हैं और अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं।The Plight of Noida's Workers: 12 Hours of Bonded Labor for ₹10,000–₹13,000—Protests Now Escalate to Violence

    एक माँ का दिल दहला देने वाला बयान इस पूरे संकट का सबसे कड़वा सच है। नोएडा की एक महिला ने आंसू बहाते हुए बताया, “अपने बच्चे को दो दिन के गैप में दवा देती हूं, ताकि दवा बची रहे। दिन का 300 रुपये मिलता है। ओवरटाइम करती हूं तो ७०० रुपये हो जाते हैं। इसी में सबकुछ करना होता है। जमापूंजी के नाम पर कुछ नहीं है।”

    कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने इस मुद्दे को उठाया है। उन्होंने कहा, “नोएडा में कर्मचारियों ने प्रदर्शन में कहा – तनख्वाह ₹10,000, 12 -13 घंटे काम। यह तो बंधुआ मजदूरी से भी बदतर है।” उन्होंने सवाल किया – “मोदी जी, विकास किसका हुआ है?”

    The Plight of Noida's Workers: 12 Hours of Bonded Labor for ₹10,000–₹13,000—Protests Now Escalate to Violence

    यह सिर्फ नोएडा की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश के असंगठित और प्राइवेट सेक्टर के श्रमिकों की पीड़ा का आईना है। महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है, लेकिन न्यूनतम मजदूरी का कानून और श्रम कानूनों का सख्ती से पालन अभी भी कागजों तक सिमटा हुआ है।

    क्या कहती है सम्पादकीय टिप्पणी:

    नोएडा जैसे औद्योगिक हब में श्रमिकों का शोषण न सिर्फ उनके परिवारों को बर्बाद कर रहा है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की नींव को भी कमजोर बना रहा है। विकास तभी सार्थक है जब हर मेहनतकश को सम्मानजनक वेतन, उचित काम का समय और बुनियादी सुरक्षा मिले। सरकार, उद्योगपति और श्रम संगठनों को मिलकर इस दर्द को समझना होगा। हिंसा किसी भी हाल में गलत है, लेकिन जब बेबसी चरम पर पहुंच जाए तो गुस्सा फूटना स्वाभाविक है। कमोबेश यह हालात सिर्फ नोयडा या एनसीआर में ही नहीं बल्कि देश के हर राज्य में हैं। लेकिन समय आ गया है कि न्यूनतम मजदूरी को वास्तविकता बनाया जाए, श्रम कानूनों का सख्त अमल हो और हर माँ को अपने बच्चे की दवा बिना गिनती के दे सकने का अधिकार मिले।

    https://x.com/i/status/2043586073323082218

    यूजर ने कहा : मांग बिल्कुल सही है ये सरकार बड़े बड़े व्यापारियों को लाभ दे रही है लेकिन गरीब जो मेहनत कर के जीवन यापन करते हैं उनका शोषण किया जा रहा है। आज की मांग है कम से कम 20000 महिने की आय होनी ही चाहिए। और 8 घंटे से अधिक काम नहीं किया जा सकता। स्वास्थ्य के लिए आराम भी आवश्यक है।

    श्रमिकों की आवाज़ सुनी जाए, समाधान निकाला जाए -तो यही सच्चा विकास है।

    Shagun

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