विश्व में बहुत से ईश्वरीय गुण हैं जिनमें प्रेम प्रथम है

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अद्भुत प्रेम और रसराज: श्रृंगार रस को यूँ ही नहीं कहा गया रसराज
राहुल कुमार गुप्त
सामान्यतः प्रेम का प्रारम्भ संयोग श्रृंगार से होता है और फिर उनमें विप्रलंभ और संयोग का उतार-चढ़ाव होता है। यही सामान्यतः होता आया है। पर आज ही के दिन 4 सितम्बर से ही 19 साल पहले एक प्रेम का प्रारंभ भी विप्रलंभ श्रृंगार से प्रारंभ हुआ और आज भी उसमें वही निरंतरता बनी हुई है।
प्रेम के इस अद्भुत रूप जिसमें प्रेम को पाने की चाह, साथ रहने की चाह द्वितीयक इसलिये भी हो जाती है कि सृष्टि को पुनः प्रेम की सही परिभाषा से अवगत कराना है। वास्तव में प्रेम की शक्ति से ही इस ब्रह्मंड का संचालन हो रहा है। तब विश्वसनीय हो जाता है की हाँ! राधा-कृष्ण की प्रेम शक्ति से संचालित है।
हमारा प्रेम भी विप्रलंभ श्रृंगार की अपार शक्तियों का एक निर्मल उदाहरण है। जिसमें आरंभ से ही 19 सालों के प्रेम को केवल वियोगी रूप मिला हुआ है, फिर भी दूर रहकर भी सामीप्यता से अधिक सामीप्य का भाव रहता है।
मानवीय जीवन भावों से निर्मित होता है जिसमें खुशियों और प्रोत्साहन के लिये रति भाव को सभी भावों में प्रधान माना गया है इसी कारण श्रृंगार रस को रसराज की संज्ञा से जाना जाता है।
श्रृंगार के दो पहलुओं में जहाँ संयोग निश्चिंतता प्रदान करता है वहीं वियोग संसार की असीम शक्तियों (दुःखदायी पलों) के सहन की क्षमता! अध्यात्म के चरम पर मन का स्वतः बढ़ जाना, यह वियोग श्रृंगार की विशेषता  बन जाती है। यह वियोग श्रृंगार ही है जिसमें प्रिय और प्रियतम को ईश्वरीय प्रतिकृति तथा प्रेम की शक्ति को ईश्वरीय शक्ति के समतुल्य मान लिया जाता है।
ऐसी शक्तियाँ ही कृष्ण को भगवान कृष्ण और राम को भगवान राम बना जाती हैं। सच्चा प्रेम सदा ईश्वरीय गुणों से ओत-प्रोत रहता है। लाभ-हानि का यहाँ किंचित मात्र स्थान नहीं।
खोने और पाने की इच्छा शून्य रहती है, रहती है तो सिर्फ प्रेम की चिंता!
प्रेम में जब प्रियतम और प्रिय दोनों को एक दूसरे के हित का संज्ञान रहता है और चिंता रहती है तब यह श्रृंगार रस वात्सल्य का रूप भी ले लेता है। इसमें तब किसी तरह का भेद नहीं रह जाता।
वो मुझसे सदा दूर ही है!  19 साल की एक लम्बी अवधि बीत चुकी! लेकिन इस अवधि में एक क्षण भी उनके समीप न होते हुए भी वो सदा समीप हैं। बिल्कुल हृदय के समीप।
मन चंचल होता है यह बात सत्य होगी और सत्य है किन्तु यह ’19 युगों से समान’ लम्बी अवधि हम दोनों के मन को प्रेम की एकाग्रता में बाँधे रखे हुए है और आगे भी रखेगी। यह ईश्वरीय शक्ति नहीं तो और क्या है?
इन दूरियों पर आधुनिकता और पाश्चात्य की आँधियाँ भी आईं पर दोनों पौर्वात्य के आध्यात्मिक और प्रेम की मजबूत जड़ों से अडिग रहे और अडिग हैं।
यह वियोग भाव से उपजे प्रेम का ही तो उदाहरण है।
इसी रसराज में कुछ मनोदशाएं इसे वात्सल्य रस, भक्ति रस तथा शांत रस से भी जोड़ता है।
जिस तरह भक्त के हृदय में आराध्य का नाम हृदतंत्री के कंपन्न में निरंतर बजता रहता है उसी प्रकार प्रेम से सराबोर हृदय में अपने प्रिय के दर्श और उसके बारे में चिंतन-मनन निरंतर होता रहता है। ऐसी मनोदशा में विप्रलंभ श्रृंगार,भक्ति रस की पराकाष्ठा में समाहित रहता है।
श्रृंगार रस तब शांत रस की भी भूमिका निभाता है जब वियोग के बाद का दुःख सहनीय हो जाता है और तब भी जब संयोग में आंतरिक सामीप्यता के बाद का क्षण आता है। वीर रस भी कहीं न कहीं न किसी न किसी के प्रेम से उपजता है। यह प्रेम राष्ट्र के प्रति हो अन्य के प्रति! इसी प्रेम से रक्षा और दान-दया के गुण भी प्रबल होते हैं जो श्रृंगार के दोनों पहलुओं से उत्पन्न हो सकता है अतः कहीं न कहीं प्रेम की कई मनोदशाओं से हृदय में वीर रस के स्थायी भाव को संबल मिलता है। शायद इसीलिये श्रृंगार रस को रसराज की संज्ञा दी गयी है।

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