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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    नोबेल मांगते ही रह गए ट्रंप

    ShagunBy ShagunOctober 11, 2025Updated:October 11, 2025 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने के बाद भी हाथ खाली
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    अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने के बाद भी हाथ खाली

    ■ ओम माथुर

    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को शांति का नोबेल पुरस्कार नहीं मिला। वैसे उन्हें पूरी दुनिया में बहुत कम लोग इसका हकदार मानता हो। खुद उनके देश अमेरिका के 80% से ज्यादा लोग उन्हें नोबेल लायक नहीं मानते थे। पिछले दिनों हुए सर्वे में यह सामने आया था। लेकिन वह कई महीनों इसे पाने के लिए अशांत थे।

    आए दिन खुद मीडिया से कहते थे उन्हें नोबेल मिलना चाहिए। उन्होंने कई युद्ध रूकवाये हैं। शायद ही नोबेल पुरस्कार के इतिहास में ऐसा कभी हुआ हो,जब इसे पाने के लिए कोई इस तरह खुलकर दावा करता रहा हो और इसके लिए मुंह मिया मिट्ठू बन खुद की उपलब्धियां गिनाता रहा हो। उन्होंने तो आठ देशों से उन्हें नोबेल पुरस्कार देने की सिफारिश तक करा ली थी। जैसे ये पुरस्कार काम से नहीं,बल्कि सिफारिश से ही मिलता हो। सिफारिश करने देशों में पाकिस्तान भी शामिल था। वो पाकिस्तान जो भारत में आतंक फैलाता है। लेकिन ट्रंप को उससे शांति के पुरस्कार के लिए सिफारिश कराने में भी शर्म नहीं आई।

    Trump kept asking for the Nobel
    अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने के बाद भी हाथ खाली

    खैर,शर्म से उनका क्या वास्ता। जब भारत ने पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था और पाकिस्तान ने घबराकर घुटने टेक दिए थे और उसने भारत से संघर्ष विराम की गुहार लगाई थी। लेकिन ट्रंप इसका श्रेय लेने से भी नहीं चूके। लगभग 40 बार उन्होंने यह कहा कि दोनों देशों को ट्रेड डील की धमकी देकर उन्होंने यह युद्ध रुकवा दिया। जबकि भारतीय सेना से सरकार तक हर स्तर पर उनके झूठ का पर्दाफाश किया गया।

    बाद में तो पाकिस्तान के विदेश मंत्री ईशाक डार ने भी स्वीकार किया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्ध विराम का प्रस्ताव अमेरिका के माध्यम से आया था। लेकिन भारत ने तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। वह ट्रंप इजराइल और ईरान के बीच भी युद्ध को खत्म करने का श्रेय लेते हैं। जबकि हकीकत ये है कि उन्होंने ही इजराइल को ईरानी ठिकाना पर हमला करने की अनुमति दी थी और ईरानी हमले से सुरक्षा के लिए इजराइल में अमेरिकी सैनिक उपकरण भी तैनात किए गए थे। यानी पहले युद्ध भड़काओ और फिर शांति का नोबेल पुरस्कार मांगो।

    Trump kept asking for the Nobel
    Trump kept asking for the Nobel

    वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारियो मचाडो को शांति का नोबेल पुरस्कार मिलने के साथ ही ट्रंप के दिल के अरमां आंसुओं में बह गए। हमारे देश में तो कहावत भी है कि मांगे से भीख नहीं मिलती और बिना मांगे मोती मिल जाते हैं। वैसे एक तथ्य ये भी है कि उनको इस साल नोबेल पुरस्कार मिल भी नहीं सकता था।

    क्योंकि इस साल के नोबेल शांति पुरस्कार की नामांकन की अंतिम तिथि 31 जनवरी 2025 थी। जबकि ट्रंप दूसरी बार 20 जनवरी को राष्ट्रपति बने थे। यानी सिर्फ 11 दिन बाद नामांकन बंद हो गया था। इतने से दिन में उन्होंने कुछ किया भी नहीं था। जिसके लिए उन्हें नोबेल मिलता। लेकिन वह शायद इस गलतफहमी में होंगे कि उनके पद और कद को देखते हुए उनके लिए पुरस्कार समिति अपने नियमों में बदलाव कर देगी। ये गलतफहमी भी दूर हो गई। लेकिन ट्रंपक्षतो ट्रंप है। वो कुछ भी सोच सकते हैं।

    कुछ भी कह सकते हैं। कहकर मुकर सकते हैं । मुकर कर मान सकते हैं। मानकर फिर मुकर सकते हैं। अपने बयानों से उन्होंने अपनी छवि किसी मसखरे जैसी बना ली। खुद अमरीका में लगातार हो रहे सर्वे बतखवा रहे हैं ट्रंप की विश्वसनीयता और लोगों का उन पर भरोसा लगातार घट रहा है। अब ये देखना भी दिलचस्प होगा कि नोबल से वंचित ट्ंप इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं। क्या वो नार्वे सरकार को बख्शगें?

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