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    Home»ख़ास खबर

    सांपों का अनोखा मेला: 300 साल पुरानी परंपरा का जश्न आज भी जारी

    ShagunBy ShagunJuly 17, 2025Updated:July 17, 2025 ख़ास खबर No Comments6 Mins Read
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    भारत सिंह / सुशील कुमार

    समस्तीपुर, 17 जुलाई 2025: बिहार के समस्तीपुर जिले के विभूतिपुर प्रखंड में सिंधिया घाट पर हर साल नागपंचमी के अवसर पर लगने वाला सांपों का मेला एक अनोखा और रोमांचक अनुभव है। इस मेले में बच्चे, युवा और बुजुर्ग सैकड़ों जहरीले सांपों को गले में लपेटकर, हाथों में पकड़कर और यहाँ तक कि मुंह में दबाकर करतब दिखाते हैं, जो देखने वालों को आश्चर्यचकित कर देता है। यह मेला मिथिला क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था का प्रतीक है।

    क्या है इतिहास और रूढ़ि परंपरा

    स्थानीय भगत रामबाबू महतो उर्फ राम सिंह के अनुसार, यह मेला लगभग 300 साल पुराना है। इसकी शुरुआत फतुरी भगत ने की थी, जो विषहरी देवी के गहबर पर कुश (घास-फूस) से सांप बनाकर पूजा करते थे। समय के साथ यह परंपरा वास्तविक सांपों की पूजा में बदल गई। मेले की शुरुआत सिंघिया बाजार स्थित मां भगवती मंदिर में पूजा-अर्चना से होती है, जिसके बाद भक्त ढोल-नगाड़ों के साथ बूढ़ी गंडक नदी के सिंधिया घाट पर पहुँचते हैं।

    नागपंचमी पर आयोजन का कारण

    नागपंचमी, हिंदू पंचांग के अनुसार सावन माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है, जो नाग देवता और माता विषहरी की पूजा का पवित्र दिन है। मान्यता है कि इस दिन सांपों की पूजा से परिवार की समृद्धि, वंश वृद्धि और सर्प दोष से मुक्ति मिलती है। मेले में भक्त नदी से सांप निकालते हैं, उन्हें दूध से स्नान कराते हैं और पूजा के बाद जंगल में छोड़ देते हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि इस परंपरा में आज तक किसी को सांप ने नहीं काटा, जो उनकी आस्था को और मजबूत करता है।

    सांपों के मेले के बाद सांपों का क्या होता है?

    बिहार के समस्तीपुर जिले के सिंधिया घाट पर नागपंचमी के अवसर पर आयोजित सांपों का मेला अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। इस मेले में लोग बूढ़ी गंडक नदी से सैकड़ों सांप पकड़कर पूजा करते हैं और करतब दिखाते हैं। लेकिन सवाल उठता है कि इन सांपों का मेले के बाद क्या होता है? मेले की परंपरा के अनुसार, भक्त नदी से सांपों को पकड़ते हैं, उन्हें दूध से स्नान कराते हैं और माता विषहरी व नाग देवता की पूजा में चढ़ाते हैं। पूजा-अर्चना के बाद, इन सांपों को जंगल में वापस छोड़ दिया जाता है। स्थानीय लोगों और भक्तों का दावा है कि तंत्र-मंत्र के जरिए सांपों का जहर अस्थायी रूप से निष्क्रिय कर दिया जाता है, ताकि पूजा के दौरान कोई खतरा न हो। इसके बाद, सांपों को उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित छोड़ा जाता है, जिससे वे जंगल में वापस लौट सकें।

    यह परंपरा मिथिला क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था का हिस्सा है, जो लगभग 300 साल पुरानी है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस प्रक्रिया से सांपों को कोई नुकसान नहीं पहुँचता, और यह पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने में भी मदद करता है, क्योंकि सांप फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले चूहों को नियंत्रित करते हैं। हालांकि, कुछ पर्यावरणविद् और पशु अधिकार कार्यकर्ता इस प्रथा पर चिंता जताते हैं। उनके अनुसार, सांपों को पकड़ने और उनके साथ करतब दिखाने से उनकी प्राकृतिक जीवनशैली प्रभावित हो सकती है, और कुछ मामलों में सांपों के दाँत तोड़ने की बात भी सामने आई है, जिससे उनकी मृत्यु हो सकती है। आयोजकों और भक्तों का कहना है कि सांपों को जंगल में छोड़कर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है, परंतु इस प्रथा को और अधिक पर्यावरण-अनुकूल बनाने के लिए आधुनिक संरक्षण उपायों पर विचार किया जा सकता है।

    सांपों के मेले में सर्पदंश की कोई घटना नहीं

    बिहार के समस्तीपुर जिले के विभूतिपुर प्रखंड में सिंधिया घाट पर नागपंचमी के अवसर पर आयोजित सांपों का मेला अपनी अनूठी परंपरा और आस्था के लिए जाना जाता है। इस मेले में सैकड़ों भक्त बूढ़ी गंडक नदी से सांप निकालकर पूजा करते हैं और उनके साथ करतब दिखाते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इतने सांपों के बीच कोई सर्पदंश की घटना या अप्रिय घटना घटी है?

    सर्पदंश की कोई घटना नहीं

    स्थानीय लोगों और आयोजकों के अनुसार, इस मेले की 300 साल पुरानी परंपरा में आज तक सांपों के डसने की कोई घटना सामने नहीं आई है। मेले में भाग लेने वाले भक्तों का दावा है कि माता विषहरी और नाग देवता की कृपा से सांपों का जहर पूजा के दौरान निष्क्रिय हो जाता है। कुछ स्थानीय लोग, जैसे नरहन पंचायत के अरविंद ‘भगत’, बताते हैं कि सांपों का विष निकाल लिया जाता है, जिससे खतरा कम हो जाता है। हालांकि, कुछ भक्तों का कहना है कि यह तंत्र-मंत्र और आस्था का चमत्कार है, और सांपों का विष नहीं निकाला जाता।

    आस्था और सावधानी का संगम

    मेले की शुरुआत मां भगवती मंदिर में पूजा-अर्चना से होती है, और भक्त ढोल-नगाड़ों के साथ सांपों को लेकर नदी किनारे जाते हैं। पूजा के बाद सांपों को जंगल में सुरक्षित छोड़ दिया जाता है।

    स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता संजीव के अनुसार –

    यह मेला प्रकृति और मानव के संबंध को मजबूत करता है। आयोजकों का कहना है कि सांपों को पकड़ने और उनके साथ करतब दिखाने में अनुभवी भक्त ही शामिल होते हैं, जो सावधानी बरतते हैं।

    सिंधिया घाट के सांपों के मेले में सर्पदंश की कोई घटना न होना आश्चर्यजनक है, खासकर जब सैकड़ों जहरीले सांपों को हाथ, गले और मुंह में पकड़ा जाता है। यह आस्था, अनुभव और संभवतः सांपों के जहर को निष्क्रिय करने की प्रथा का परिणाम हो सकता है। हालांकि, पर्यावरणविदों का मानना है कि सांपों को पकड़ने और बार-बार परेशान करने से उनकी सेहत पर असर पड़ सकता है। फिर भी, मेले में कोई अप्रिय घटना न होने का दावा स्थानीय लोगों की आस्था को और मजबूत करता है।

    सिंधिया घाट का सांपों का मेला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह मिथिला की सांस्कृतिक विरासत और साहस का भी प्रदर्शन करता है। यह आयोजन समस्तीपुर के साथ-साथ खगड़िया, सहरसा, बेगूसराय और मुजफ्फरपुर जैसे जिलों से हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। हालांकि, सांपों को पकड़ने और उनके साथ करतब दिखाने की प्रथा पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय हो सकती है। यह मेला न केवल स्थानीय लोगों के लिए, बल्कि देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए भी एक आकर्षण का केंद्र है, जो बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को उजागर करता है।

    #snake fair at Scindia Ghat Samastipur
    Shagun

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