आज ही सुबह गये थे श्मशान घाट,
उद्देश्य था चिता जलाने वाले की चिंता हरना।
उधर जल रही थी भाभी की चिता,
इधर शुरू हो गया संपत्ति के लिए लड़ना।।
भाई हो, सोच लो जरा अपनों के बारे में,
आखिर हम सभी को भी तो है एक दिन मरना।।
यहां धन के लिए ही है बनते हैं सब अपना,
खाट पर पड़ते ही बेटा से पड़ता है डरना।
आखिर जब ही जिंदगी बेवफा है,
तो क्या दूसरों पर भरोसा क्या करना।
सद्मार्ग पर चलने की करो कोशिश,
यहां नहीं कोई पराया, ना ही है कोई अपना।।
– उपेन्द्र नाथ राय “घुमंतू”







