संविधान में दी गयी व्यवस्था के तहत पदोन्नति में आरक्षण पर दलित कार्मिकों के लिये क्रीमीलेयर नहीं हो सकता लागू
लखनऊ, 24 अगस्त 2018: आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति,उप्र की प्रान्तीय कार्यसमिति की आज एक आवश्यक बैठक में आरक्षण समर्थकों ने कहा कि भारत सरकार द्वारा पदोन्नति में आरक्षण दिये जाने के लिए जो सर्कुलर जारी कर राज्यों को पदोन्नति में आरक्षण देने का निर्देश दिया गया था, यूपी में उसका कोई मतलब नहीं है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार से केन्द्र सरकार ने पिछले 4 सालों से अधिक समय से पदोन्नति में आरक्षण बिल को लोकसभा में लटका कर देश के दलित समाज को अपमानित कराया है, वह दलित विरोधी नीति को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि बड़े दुर्भाग्य की बात है कि जब देश में दलित वर्ग के लिये कोई भी कानून बनता है तो उस पर हल्ला मचने लगता है। अब पदोन्नति में आरक्षण पर क्रीमीलेयर की बात हो रही है, सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब संविधान में यह व्यवस्था दी गयी है कि दलित समाज क्रीमीलेयर की श्रेणी में नहीं आयेगा। क्योंकि वह अनुसूचित जाति/जनजाति संवर्ग में होने के नाते संवैधानिक व्यवस्था के तहत पिछड़ा है। आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम नहीं है, ऐसे में दलित समाज को संवैधानिक व्यवस्था के तहत न्याय मिलना चाहिए।
आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति,उप्र के संयोजकों अवधेश कुमार वर्मा, केबी राम, डा. रामशब्द जैसवारा, आरपी केन, अनिल कुमार, अजय कुमार, श्याम लाल, अन्जनी कुमार, प्रेमचन्द्र, अशोक सोनकर, दिनेश कुमार, अजय चैधरी, राम औतार, सुनील कनौजिया ने एक संयुक्त बयान में कहा कि पूरे देश के दलित समाज को केन्द्र की मोदी सरकार लगातार भरमा रही है। उप्र के कुछ दलित नेता जो जल्दी ही भाजपा में शामिल हुए हैं, वह केन्द्र सरकार द्वारा पदोन्नति में आरक्षण दिये जाने के 15 जून के आदेश पर प्रेस कांफ्रेंस कर बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे कि उप्र के दलित कार्मिकों को जल्द ही पदोन्नति में आरक्षण मिलेगा, लेकिन अब वह चुप्पी साध कर बैठ गये हैं। क्योंकि उप्र की सरकार पदोन्नति में आरक्षण देने की बात तो दूर अभी भी शिक्षा विभाग में दलित अध्यापकों के वेतन फ्रीज व रिवर्शन पर अमादा है। जो यह सिद्ध करता है कि उसे दलित वर्ग के कार्मिकों से कोई लेना देना नहीं है।







