या फिर सियासी जनसभाओं/रैलियों में भी लाउडस्पीकर पर पाबंदी लगाओ
त्योहार और धार्मिक गतिविधियों में ही लाउडस्पीकर बजना पर्यावरण व कानून व्यवस्था के लिए खतरनाक है
सियासी जनसभाओं और रैलियों में क्या लोरी सुनाता है लाउडस्पीकर !
नवेद शिकोह
लखनऊ, 27 फरवरी। इंसान ही कानूनी और सरकारी फैसला सुनाते हैं। लेकिन जब फैसले सुनाते हैं तो ये इंसान नहीं रहते, हुक्मरान हो जाते हैं। ये भूल जाते हैं कि होली मनाने वाले इंसानों को पर्यावरण का भी ख्याल है और किसी बीमार का एहसास भी है।
हर त्योहार के रंग होते है। मस्ती और शोर-शराबे के बिना होली नहीं मनायी जा सकती। डीजे होली का महत्वपूर्ण अंग है। त्योहारों की उमंग और मस्ती के भी साइंटिफिक अर्थ होते है। चिंताओं-कुंठाओं, प्रतिस्पर्धाओं, ग़मों, नफरतों, जरुरतों… को भूल कर जब हम उल्लास और उमंगों में खो जाते हैं तो हमारे दिल और दिमाग को जकड़े तनाव की पकड़ कमजोर पड़ जाती है।
वह सवाल जो आम लोगों को परेशान करते है ?
- नवरात्रि के व्रत की तरह। जो अनाज रूटीन प्रकिया में हमारे शरीर में जहरीले तत्व पैदा करने की संभावनाओं पैदा कर रहा होता है उस घातक प्रकिया पर ब्रेक लगा देते हैं व्रत।
- ये बातें आम हैं। हम आम इंसान अपने बीच के ही कुछ आम इंसानों को खास बनाकर अपेक्षा करते हैं कि वो कुछ खास करेंगे।
- हम सरकार चलाने की कुर्सी तुम्हें क्यो देते हैं? इसलिए नहीं कि तुम मदारी बनकर हमें बंदर बनाकर नचाओ। हम इसलिए तुम्हें सत्ता की कुर्सी देते हैं कि तुम हमारी भावनाओं को समझो। हमारी छोटी-छोटी खुशियों का ख्याल रखो। हमारे धार्मिक अधिकारों की रक्षा करो।
- हमारी ही बनवायी हुयी सरकार के तानाशाह और बेतुके फैसले हम बर्दाश्त क्यों करें?
- साल भर बाद की होली के चंद घंटे में पर्यावरण के नुकसान की फिक्र सताने लगाती है। इसलिए हमारे त्योहार पर हमारी मस्ती के अधिकार को छीन लिया जाता है। हमारी उमंगों और उत्साह पर पहरे बैठा दिये जाते हैं।
- लाउडस्पीकर /डीजे अगर कानून व्यवस्था का खतरा है तो कानून व्यवस्था को संभालने के बजाय विविधता और त्योहारों के रंगों वाले इस देश के सौंदर्य को ही फीका कर देना क्या सही कदम हैं ?
- कानून व्यवस्था चौकस हो तो डीजे कानून व्यवस्था के लिए हरगिज़ खतरा नही बन सकता। और कानून व्यवस्था लचर हो तो कब्रिस्तान में भी खून खराबा हो सकता है।
- चलिये हम होली पर डीजे/लाउडस्पीकर को पर्यावरण और कानून व्यवस्था का खतरा मान लेते है। ये भी मान लेते हैं कि धर्म और त्योहार के नाम पर हमें लाउडस्पीकर का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए है। हम ये भी मान लें कि धर्मिक/आध्यात्मिक और त्योहारों की गतिविधियों पर लाउडस्पीकर पर पाबंदियां सही हैं।
- लेकिन सत्तानशीन नेताओ ये बताओ कि क्या राजनीतिक रैलियों वाला लाउडस्पीकर पर्यावरण के लिए लाभकारी होता है?
- क्या सियासी रैलियों /जलसों/कार्यक्रमों/जनसभाओं के कानाफाड़ू लाउडस्पीकर और इसमें इकट्ठा भीड़ कानून व्यवस्था के लिए खतरा नहीं बन सकती है।
- धर्म और त्योहार पर ही लाउडस्पीकर की पाबंदी। राजनीतिक सभाओं में ये पाबंदी लागू क्यों नहीं होती !
- ये सवाल कभी किसी ने नहीं उठाया। लाउडस्पीकर पर पाबंदी से जुड़ा ये पहला सवाल है जो लाखों चुप जुबानी को आवाज देगा। और अब इस सवाल का जवाब देना ही होगा।







