निजीकरण के कैबिनेट फैसले पर रोक के लिए आयोग को सौंपा जनहित प्रत्यावेदन

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  • उपभोक्ता परिषद ने कारपोरेशन प्रबन्धन पर बोला हमला कहा ऊर्जा इतिहास की अब तक की सबसे बडी बिजली वृद्धि कराने के बाद जब प्रबन्धन राजस्व वसूली कराने में हो गया फेल तो अपनी अक्षमता छिपाने के लिय निजीकरण की चल दी चाल
लखनऊ, 19 मार्च। उप्र सरकार की कैबिनेट द्वारा बिना नियामक आयोग की अनुमति लिये 5 शहरों लखनऊ, गोरखपुर, मेरठ, वाराणसी एवं मुरादाबाद का निजीकरण किये जाने के फैसले के खिलाफ आज उप्र राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने उप्र विद्युत नियामक आयोग के चेयरमैन श्री एस के अग्रवाल से मुलाकात कर एक लोक महत्व जनहित प्रत्यावेदन सौंपा।
जिसमें यह मुददा उठाया कि विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 14 के तहत किसी भी विनिर्दिष्ट क्षेत्र (स्पेसीफाइड) का चयन अधिनियम के आधीन आयोग को करना है ऐसे में बिना आयोग की अनुमति के उप्र सरकार द्वारा 5 शहरों का चयन किस मानक पर किया गया। यह विद्युत अधिनियम 2003 के प्राविधानों के विपरीत है।
उपभोक्ता परिषद ने अपने प्रत्यावेदन में पूर्व में आयोग द्वारा जारी लखनऊ की फे्रन्चाईजी सेस पर रोक संबंधी आदेश व उपभोक्ता परिषद के प्रत्यावेदन पर अप्रैल 2013 में आयोग द्वारा जारी आदेश का संदर्भ देते हुये आयोग को अवगत कराया गया कि सरकार द्वारा लिया गया फैसला संवैधानिक नही है। इसलिये आयोग जनहित में अविलम्ब सरकार के 5 शहरों के निजीकरण के कैबिनेट निर्णय पर अविलम्ब रेाक लगाये।
आयोग अध्यक्ष श्री एस के अग्रवाल ने उपभोक्ता परिषद द्वारा रखे गये पूर्व आदेशों व विद्युत अधिनियम 2003 के प्राविधानों के तहत उस पर विचार करने का भरोसा दिलाया।
उप्र राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि पावर कारपोरेशन प्रबन्धन पहले प्रदेश के ग्रामीण व किसानों की बिजली दरों में 50 से 150 प्रतिशत की वृद्धि कराया अनाप शनाप लगभग 3000 करोड रू. के मीटर खरीद व प्रक्रियाधीन प्री पेड मीटर खरीद पर मोहर लगवायी और अब जब प्रदेश में बढी बिजली दरों के मुताबिक राजस्व नही प्राप्त हो रहा है तो पावर कारपोरेशन प्रबन्धन ने प्रदेश के मुख्यमंत्री को भ्रमित कर ध्यान भटकाने के लिये निजीकरण का फैसला करा दिया।
ऊर्जा क्षेत्र के इतिहास में मार्च माह में जब राजस्व सबसे ज्यादा वसूला जाता है उस समय अब पूरा ऊर्जा क्षेत्र आन्दोलित है पावर कारपोरेशन प्रबन्धन अपनी अक्षमता को छिपाने के लिये सरकार से निजीकरण की घोषणा कराकर सरकार की छवि धूमिल करने पर आमादा है। सबसे बडा चौकाने वाला सवाल यह है कि उप्र सरकार प्रबन्धन से यह पूछने को तैयार नही है कि जब ऊर्जा क्षेत्र के इतिहास में सबसे बडी बिजली दर वृद्धि करा ली गयी तब अब क्यों आर्थिक संकट का रोना रोकर निजीकरण कराया जा रहा है। प्रदेश में सरकारी विभागों पर 10 हजार करोड के ऊपर बकाया है इसके लिये कौन जिम्मेदार है?

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