- संघर्ष समिति ने प्रदेश के 8 लाख दलित कार्मिकों से की अपील वह आन्दोलन के लिये रहें तैयार और जारी रखें अपना विभागवार जागरूकता अभियान
- नियमों की परिधि में आरक्षण देने का काम राज्य सरकारों का, वह चुप बैठी हैं तो दलित कार्मिकों को कैसे मिलेगा आरक्षण का लाभ?
लखनऊ, 05 जून। आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति, उप्र के संयोजकों की आज एक आपात बैठक में पदोन्नति में आरक्षण दिये जाने के मुद्दे पर सम्पन्न हुई। संघर्ष समिति ने पुनः अपनी मांग दोहराते हुए कहा कि जब तक लोकसभा में लम्बित पदोन्नति में आरक्षण संवैधानिक संशोधन 117वां बिल नहीं पास हो जाता, तब तक दलित कार्मिकों को पदोन्नति में आरक्षण का लाभ मिलना सम्भव नहीं है।
संघर्ष समिति ने कहा कि जहां तक सवाल है नियमों की परिधि में पदोन्नति में आरक्षण दिये जाने का तो देश के सभी राज्य की सरकारों को यह पता ही है कि संविधान पीठ एम. नागराज केस में 2006 में पारित निर्णय के अनुसार राज्य की सरकारें पिछड़ापन, प्रतिनिधित्व व दक्षता के आधार पर दलित कार्मिकों को पदोन्नति में आरक्षण दे सकती थीं, फिर क्यों नहीं दिया और प्रदेश में दलित कार्मिक क्यों रिवर्ट किये गये और क्यों उनकी पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था समाप्त की गयी? आरक्षण का कानून संविधान के दायरे में बनाने का अधिकार राज्य सरकारों का है। फिर राज्य सरकारें दलित कार्मिकों का उत्पीड़न क्यों कर रही हैं?
आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति के संयोजकों अवधेश कुमार वर्मा, आरपी केन, अनिल कुमार, अजय कुमार, श्याम लाल, अन्जनी कुमार, एसपी सिंह, बीना दयाल, अशोक सोनकर, दिनेश कुमार, प्रेम चन्द्र, अजय कुमार ने कहा कि केन्द्र की मोदी सरकार यदि वास्तव में दलित कार्मिकों की हितैषी है तो वह लोकसभा में लम्बित बिल को पारित कराकर दलित कार्मिकों को उसका अधिकार दिलाये। जिस प्रकार से पिछले 4 वर्षों से केन्द्र की मोदी सरकार पदोन्नति बिल पर राजनीति कर रही है, उससे यह सिद्ध होता है कि मोदी सरकार दलित कार्मिकों को सिर्फ मूर्ख बना रही है। प्रदेश के सभी 8 लाख दलित कार्मिकों से अपील है कि वह आन्दोलन के लिये तैयार रहें और अपना जागरूकता अभियान जो विभागवार चल रहा है, उसे जारी रखें।







