लखनऊ, 10 जून। संघर्ष समिति ने उप्र के 8 लाख दलित कार्मिकों को पदोन्नति में आरक्षण का लाभ दिलाने के लिये आज से ‘सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू कराओ महाअभियान’ की शुरुआत की। इसी क्रम में उन्होंने आज से सभी पार्टी के अध्यक्षों, सांसदों, विधायकों, मंत्रियों व पार्टी पदाधिकारियों से मिलकर सुप्रीम कोर्ट आदेश को उप्र में अविलम्ब कराने हेतु सहयोग मांगेंगे।
आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति उप्र के संयोजक अवधेश कुमार वर्मा के नेतृत्व में व अन्य संयोजकों केबी राम, डा. रामशब्द जैसवारा, आरपी केन, अनिल कुमार अजय कुमार, श्याम लाल, अन्जनी कुमार, अशोक सोनकर ने आज उप्र की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के मुख्यालय की ओर कूच किया।
सबसे पहले संघर्ष समिति का प्रतिनिधि मण्डल भाजपा के प्रदेश कार्यालय पहुंचा जहां पर प्रदेश अध्यक्ष के बाहर होने की वजह से उनके नाम सम्बोधित एक ज्ञापन भाजपा मुख्यालय प्रभारी भारत दीक्षित को सौंपा, उसके बाद संयोजक मण्डल ने बहुजन समाज पार्टी प्रदेश मुख्यालय पहुंचकर बसपा प्रदेश अध्यक्ष आरएस कुशवाहा से मुलाकात कर एक ज्ञापन सौंपा।

संघर्ष समिति प्रतिनिधि मण्डल कांग्रेस के प्रदेश कार्यालय भी गयी लेकिन वहां किसी से मुलाकात नहीं हुई। इसके बाद संघर्ष समिति का काफिला समाजवादी पार्टी मुख्यालय पहुंचा जहां सपा के प्रदेश अध्यक्ष श्री नरेश उत्तम से मुलाकात कर उन्हें भी एक ज्ञापन सौंपा और यह मांग उठायी कि सुप्रीम कोर्ट आदेश को अविलम्ब उप्र सरकार से लागू करवाया जाये, जिससे दलित कार्मिकों की पदोन्नति का रास्ता साफ हो सके। बसपा व सपा के प्रदेश अध्यक्षों ने इस मुद्दे पर अपना सकारात्मक आश्वासन संघर्ष समिति को दिया, वहीं भाजपा कार्यालय प्रभारी द्वारा शीघ्र प्रदेश अध्यक्ष से मुलाकात कराने का आश्वासन दिया गया।
संघर्ष समिति के नेताओं ने कहा कि संघर्ष समिति द्वारा प्रदेश के मा. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दो दिन पूर्व एक पत्र लिखकर समय मांगा है। समय मिलते ही मुख्यमंत्री जी के सामने भी संघर्ष समिति सुप्रीम कोर्ट आदेश के अनुपालन में यह मांग उठायेगी कि आरक्षण अधिनियम 1994 की धारा 3(7) को अविलम्ब बहाल किया जाये, जिससे दलित कार्मिकों की पदोन्नति हो सके।
संघर्ष समिति के अध्यक्ष ने कहा कि बड़़े दुर्भाग्य की बात है कि जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश रिवर्शन के लिये आया था तो एक माह के अन्दर प्रदेश के लगभग 2 लाख दलित कार्मिकों हजारों को पदों से और लाखों को वरिष्ठता में रिवर्ट कर दिया गया था और अब जब पदोन्नति के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट का आदेश आ गया है तो पूरा प्रशासन चुप्पी साधे है, जो आरक्षण विरोधी मानसिकता को उजागर कर रहा है।







