10 करोड़ से ऊपर के सभी खर्चों का स्कीमवाइज बिजली कम्पनियों को आयोग से लेना था अनुमोदन, लेकिन क्यों नहीं लिया?

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उपभोक्ता परिषद ने जब बिजली दर सुनवाई में उठाया मुद्दा तो अब पावर कार्पोरेशन टैरिफ विंग ने सभी प्रबन्ध निदेशकों से मांगी रिपोर्ट, मचा हड़कम्प
लखनऊ, 29 जनवरी 2019: उप्र विद्युत नियामक आयोग द्वारा मल्टी इयर टैरिफ रेगुलेशन, 2014 लागू किया गया, जिसके तहत बिजली कम्पनियों को वर्ष 2020 तक रेगुलेशन के तहत 10 करोड़ के ऊपर के सभी खर्चों के औचित्य का अनुमोदन नियामक आयोग से वर्ष 2017-19 से वर्ष 2019-2020 तक लेना था, लेकिन बिजली कम्पनियाँ विगत् वर्ष एक साथ बिजनेस प्लान 3 वर्षों का अनुमोदित कराकर यह भूल गयीं कि उन्हें स्कीमवाइज 10 करोड़ के ऊपर के सभी खर्चों पर आयोग से अनुमोदन भी लेना है। वह इसलिए भी जरूरी था क्योंकि आयोग जाँच-परख ले कि वास्तव में यह खर्चा कितना जरूरी है? और उपभोक्ताओं के हित में है।
बिजली कम्पनियों व पावर कार्पोरेशन में बढ़ती फिजूलखर्ची के खिलाफ विगत् दिनों जब उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष ने विद्युत नियामक आयोग में बिजली दर की सुनवाई के समय लिखित रूप में यह आपत्ति उठा दी कि आयोग बिजली कम्पनियों के 10 करोड़ से ऊपर के सभी खर्चों को अनिवार्य रूप से अनुमोदन दे, जिससे फिजूलखर्ची पर प्रतिबन्ध लगे।  फिर क्या था उपभोक्ता परिषद की पूरी आपत्तियों को जब पावर कार्पोरेशन को भेजा गया, तो पावर कार्पोरेशन के होश उड़ गये और पावर कार्पोरेशन की टैरिफ विंग द्वारा सभी बिजली कम्पनियों के प्रबन्ध निदेशकों को उपभोक्ता परिषद की आपत्ति के साथ तुरन्त यह पत्र भेजा गया कि फिजूलखर्ची को रोकने के लिए उपभोक्ता परिषद ने 10 करोड़ के ऊपर के सभी खर्चों का अनुमोदन आयोग से लेने की बात कही है और चूँकि मल्टी इयर टैरिफ रेगुलेशन के बिन्दु सं0 23ए में यह कानून पहले से प्रतिस्थापित है, इसलिए अविलम्ब बिजली कम्पनियाँ 3 सालों की  सूचना अविलम्ब पावर कार्पोरेशन टैरिफ विंग को उपलब्ध करायें, और फिर क्या था, बिजली कम्पनियों में हड़कम्प मचना स्वाभाविक था।  क्योंकि कहीं न कहीं जब इन खर्चों के औचित्य पर नियामक आयोग परीक्षण करेगा तो स्वतः फिजूलखर्ची का खुलासा होना तय है।
राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष व विश्व ऊर्जा कौंसिल के स्थाई सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि जिस प्रकार से बिजली कम्पनियों में फिजूलखर्ची बढ़ी है उसका खामियाजा प्रदेश की जनता को भुगतना पड़ रहा है।  चाहे वह मनमाने तरीके से मीटर खरीद का मामला हो, ओ.एण्ड एम. खर्च में बढ़ोत्तरी का मामला हो, बड़े पैमाने पर 100 करोड़ से ज्यादा कन्सलटेन्टों के रखने का मामला हो, आईटी विंग में कन्सलटेंटों को रखने या नये ऐप बनवाने का मामला हो, या फिर अनाप-शनाप टेण्डरबाजी का या फिर दक्षता बढ़ाने के नाम पर नगद इनाम बांटने का मामला हो और वहीं उसके विपरीत अपेक्षित सुधार न प्राप्त होना अपने आप में बड़ा सवाल है।  ऐसे में यदि विद्युत नियामक आयोग गहनता से 10 करोड़ के ऊपर के कार्यों के औचित्य का सघन परीक्षण करेगा तो निश्चित तौर पर बिजली कम्पनियों में फिजूलखर्ची पर प्रतिबन्ध लगेगा।
वर्तमान में बिजली कम्पनियों का कुल घाटा लगभग 85 हजार करोड़ के करीब है जो गंभीर मामला है।  पहले जो ओ.एण्ड एम. खर्च जो बिजली कम्पनियों का लगभग 3500 करोड़ होता था वह वर्ष 2017-18 में लगभग 7418 करोड़ पहुँच गया और वर्ष 2018-19 में 8328 करोड़ तक पहुँचा, जिसमें आयोग ने कटौती भी की, लेकिन सवाल यह उठता है कि यह सब खर्च बेतहाशा क्यों बढ़ रहा है।  इसकी उच्च स्तरीय जाँच होना आवश्यक है।

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