Post Views: 713
जी के चक्रवर्ती
वर्तमान समय मे हमारी इस दुनिया में ऐसे व्यक्तियों की संख्या तेजी से बढ़ी है जिन्होंने अपने शरीर को क्रायोजेनिकली संरक्षित रखने के लिये कंपनियों को बहुत बड़ी धन राशि प्रदान की है। ऐसे लोगों को मृत्यु के पश्चात भी भविष्य मे अपने पुनर्जीवन की आशा आशान्वित है। मरण शील व्यक्ति की जीवित रहने की इच्छा जैसी बातें कभी हमारे धार्मिक ग्रन्थों में दुनिया मे महान आश्चर्य कहकर उल्लेख किया गया है लेकिन आज वैज्ञानिक अपने अनुसंसाधनो से इस बात को नकारने वाली बात को साबित करने की तैयारी में लगे हुए है कि भविष्य में हम इन्सानो की और जीने की चाह या अमर होने की चाह भी सच में संभव होेगी।
मृत्य व्यक्ति के पार्थिव शरीर को वर्षों तक सुरक्षित रखने के लिए प्रयोग लाये जाने वाले तकनीक को क्रोनिक्स कहते है। क्रायोजेनिक तकनीक को ‘निम्नतापकी’ कहा जाता है, जिसका तापमान -0 डिग्री से -150 डिग्री सेल्सियस होता है। ‘क्रायो’ यूनानी शब्द ‘क्रायोस’ से बना है, जिसका अर्थ ‘बर्फ जैसा ठण्डा’ होता है।
यह वैज्ञानिक तकनीकी फ़तांशी कहानियो से उत्पन्न हुई है जिसमे शरीर को भविष्य मे पुनर्जीवन देने की आशा मे संरक्षित किया जाता है। वर्तमान समय तक विज्ञान अभी इतना अधिक विकसित नही हो पाया है कि वह इन हिमीकृत शरीर को पुनर्जीवित कर पाने में सक्षम हो। इसके बावजूद अभी तक 350 व्यक्तियों के पार्थिव शरीर को हिमीकृत किया जा चुका है एवं 3000 व्यक्तियों ने अपने मृत्यु से पूर्व ही अपने शरीर को हिमीकृत करवाने के लिये आरक्षण करवा रखा है। मृत्य शरीर को हिमीकरण कर मानव शरीर को संरक्षण करने का काम एक व्यवसाय के रूप में संपूर्ण विश्व में केवल तीन प्रमुख कंपनीयों द्वारा ही नियंत्रित एवं संचालित किया जा रहा है। इसके अलावा कुछ अन्य कंपनीयां भी है जो शरीर का हिमीकरण करती है और इन कंपनीयों के पास मृत्य शरीर को संरक्षण केंद्र तक पहुचाने का व्यवसाय कर रही है।
क्या अनंत काल तक संरक्षित किया जा सकता है शरीर:
वर्ष 1964 मे एक वैज्ञानिक एवं लेखक राबर्ट एटीन्गर (Robert Ettinger) ने 62 पृष्ठों का एक घोषणा पत्र प्रकाशित किया था जिसका नाम था “द प्रास्पेक्ट ऑफ़ इम्मोर्टलीटी (अमरत्व की संभावना)”, मौजूदा समय मे यह घोषणा पत्र बढ़कर 200 पृष्ठों का बन चुका है और वह अब इस तकनीक से जुड़े वैज्ञानिकी की नैतिक पक्ष एवं आर्थिक पक्ष जैसी विभिन्न पहलुओं का ध्यान रखते हुए अनेक विन्दुओं को इसमें समावेश किया गयाम है।
हमारी मानव सभ्यता यदि इसी रफ्तार से भविष्य में भी विकसित होती रही तो निश्चित रूप से आने वाले दिनों मे चिकित्सा विज्ञान शरीर मे हुई किसी भी तरह की क्षति का उपचार करने मे पूर्णतः सक्षम होगी। जिसमे हिमीकृत से पैदा हुई किसी भी तरह की क्षति के साथ मृत्यु के कारणों का पता लगा पाने में भी सक्षम हो जाएगी। क्या अत्यंत कम तापमान पर किसी मृत व्यक्तियों के शरीर में बिना किसी भी प्रकार की क्षति हुए अनंत काल तक संरक्षित किया जा सकता है?
वर्ष 2011 मे राबर्ट एटींगर का शरीर भी उसके पहले संरक्षित उनकी माता और दो पत्नियों के शरीर के साथ भविष्य मे पुनर्जीवन की आशा से उन्हें भी संरक्षित किया गया था।
दरअसल मृत्यु के तुरंत बाद शरीर को एक बाह्य बर्फ़ के पैकेटो की सहायता से शीतल कर संरक्षण केंद्र तक पहुंचाया जाता है। मृत्यु के बाद जितनी जल्दी से जल्दी हो सके, लाश को ठंडा कर जमा दिया जाता है ताकि उसकी कोशिकाएं, ख़ास कर मस्तिष्क की कोशिकाएं, ऑक्सीजन की कमी से टूट कर नष्ट न हो जाएं। इसके लिए पहले शरीर को बर्फ़ से ठंडा कर दिया जाता है और फिर संरक्षण केंद्र मे पहुंचने के पश्चात शरीर से रक्त निकाल लिया जाता है एवं शरीर के अंगों के हिमीकरण से बचाव के लिये धमनीयों मे हिमीकरण रोधी द्रव डाला जाता है तथा खोपड़ी मे छोटे छिद्र बनाये जाते है। इसके बाद ज़्यादा महत्वपूर्ण काम शुरू होता है। शरीर से ख़ून को बाहर निकाल कर उसकी जगह रसायन द्रव्य डाला जाता है, जिन्हें ‘क्रायो-प्रोटेक्टेंट’ तरल कहते हैं। ऐसा करने से अंदुरुनी अंगों में बर्फ नही बन पाते है यह ज़रूरी इसलिए भी है कि शरीर के अंदुरुनी भाग में यदि बर्फ़ जम जाए तो वह अधिक जगह लेगा जिससे कोशिकाओं की दीवार टूट जाएगी। इसके पश्यचत शरीर के एक शयन बैग मे डाल कर द्रव नाइट्रोजन मे -196 °C तापमान पर रख दीया जाता है।
अमरीका जैसे देश में 150 से अधिक लोगों ने अपने शरीर को तरल नाइट्रोजन से ठंडा कर भविष्य के लिए रखवाए हैं। इसके अलावा 80 से अधिक लोगों ने सिर्फ़ अपना मस्तिष्क सुरक्षित रखवाया है। पूरे शरीर को जमा कर सुरक्षित रखने में 1,60,000 डॉलर ख़र्च हो सकता है। मस्तिष्क को सुरक्षित रखने में 64,000 डॉलर का ख़र्च आता है।
लोगो ने इस आशा मे अपने शरीर का हिमीकरण करा रहे है कि भविष्य में चिकित्सा विज्ञान उनकी मृत्यु को पुनः लौटा कर उन्हे फिर से जीने का एक और अवसर देगा। इस तकनीक के समर्थक लोगो का कहना है कि कुछ ऐसे जीव भी है जो हिमीकरण के पश्चात स्व्यं ही पुनर्जीवित हो उठते है। पृथ्वी पर पाए जाने वाले इन जीवो मे अंटार्कटिक क्षेत्र में पाये जाने वाले जमीनी गिलहरियां एवं कुछ प्रजाति अंटार्कटिक ऊनी कंबल कीड़ा टार्डीग्रेड्स शामिल है।
इस तकनीक के समर्थक लोगों का मानना है कि भविष्य मे चिकित्सा विज्ञान इतना अधिक विकसित हो जायेगा कि इन व्यक्तियों को पुनर्जीवन देने में सक्षम होगा।
पुनर्जीवन की आश मे शरीर संरक्षण की कीमत कम नही है। एक शरीर के संरक्षण की किमत संरक्षित कंपनी के अनुसार 30,000$ से 200,00 $ के मध्य होती है।
क्या इस बात की कोई गारंटी है कि भविष्य का चिकित्सा विज्ञान शास्त्र मृत्यु को पराजित कर मनुष्यों को पुनर्जीवन दे पाने में सक्षम होगा? वैसे इस बात की कोई गारंटी नही है कि हिमीकरण से सामान्य स्थिति मे शरीर को पुनः वापस लाने की प्रक्रिया मे शरीर को किसी प्रकार का कोई नुकसान नही पहुंचेगा। हिमीकरण से वापस लाने पर शरीर की मांशपेशीया पहले जैसी स्थिति मे नही लाई जा सकती है। यदि किसी भी तरह से मनुष्य के शरीर को हानि पहुंचने से बचाया भी जा सके तो इस बात की कोई गारंटी नही है कि मानव के साथ अन्य जीवो को भी पुनर्जीवित किया जा सकेगा। इस सवाल का जवाब तो फिलहाल विज्ञान ही दे सकेगा!