बाजाओ आदिवासियों का ‘ब्रेथ कंट्रोल सिस्टम’ बना विज्ञान के लिए चुनौती

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बिना ऑक्सीजन 13 मिनट तक पानी में कैसे शिकार करते हैं बाजाओ आदिवासी, वैज्ञानिक भी अचंभित

ये दुनिया बहुत से अचंभित करने वाले लोगों से भरी पड़ी है वही कुछ ऐसे लोग भी है समय- समय पर विज्ञान के लिए चुनौती बन जाते है उन्ही में से एक है अंडमान निकोबार अंडमान निकोबार और दक्षिण पूर्व एशिया की बजाओ आदिवासी सभ्यता! कहते हैं यह आदिवासी लोग सांस रोककर बिना ऑक्सीजन के 13 मिनट तक पानी में रह कर शिकार कर सकते हैं!

शोधकर्त्ता कहते है कि उनका एक सांस में 70 मीटर गहरे समंदर में उतरना और फिर वहां बिना किसी ऑक्सीजन के करीब 13 मिनट तक मछलियां पकड़ना यह वाकई विज्ञानं के लिए अजूबा है।

उन पर लंबा शोध करने के बाद वैज्ञानिकों ने भी दावा किया है कि यह सब वह वास्तव में जीन में बदलाव के होने के कारण ऐसा कर प् रहे हैं। बाजाओ कबीले के सुबह तड़के ही कबीले से निकल कर बाहर भोजन कि तलाश में चले जाते हैं वह लोग हर दिन भोजन की तलाश में समंदर में गोता लगाते हैं।

आम तौर पर वह बिना किसी ऑक्सीजन के 70 मीटर की गहराई तक चले जाते हैं। उस गहराई पर वह एक सांस में 13 मिनट तक पैदल चल या फिर तैर सकते हैं। तलहटी में पैदल चलते हुए वे नुकीले बर्छों से शिकार करते हैं। ये गोताखोर अपने रोजमर्रा के कामकाज का 60 फीसदी हिस्सा समंदर के अंदर ही बिताते हैं। बाजाओ कबीले के लोग आमतौर पर इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस और भारतीय द्वीप समुदाय अंडमान निकोबार में पाये जाते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार बाजाओ कबीले के लोगों को पानी रहते हुए जीन में परिवर्तन हुआ है जिससे उनकी तिल्ली या प्लीहा वक्त के साथ काफी बड़ी हो गयी है जिससे पेट में मौजूद तिल्ली शरीर में ऑक्सीजन से समृद्ध लाल रक्त कणिकाओं को स्टोर रखती है। जब जरूरत पड़ती है तब तिल्ली से कणिकाएं निकलती है और पर्याप्त ऑक्सीजन मुहैया कराती हैं। बड़ी तिल्ली के चलते बाजाओ गोताखोरों के शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई ज्यादा हो सकती है। इसके चलते वह काफी देर तक समंदर के अंदर सांस रोक पाने में सफल होते हैं।

इस दौरान वह तल पर आराम से पैदल चलते हैं और बरछे की मदद से मछली या किसी दूसरे समुद्री जीव का पीछा करते हैं। पानी के भीतर उनका दिल हर मिनट 72 के बजाए सिर्फ 30 बार धड़कता है। गहरे पानी के दबाव उनके फेफड़ों को कस देता है लेकिन इसके बावजूद वह आराम से शिकार में लगे रहते हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि अब हमारे पास इस बात के चौंकाने वाले उदाहरण भी हैं कि इंसान कैसे जीन संबंधी बदलाव करते हुए संमदर में खाना खोजने वाला बंजारा बन गया।

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