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    संविधान नहीं कुछ लोगों की सियासत पर खतरा

    By April 5, 2018 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
    इस समय संविधान और आरक्षण पर खतरा बताना सियासी फैशन बन गया है। दिलचस्प यह कि जो सत्ता में रहते हुए अपनी जिम्मेदारियों का सम्यक और ईमानदारी से निर्वाह न करने वालों को भी संविधान पर खतरा दिखाई दे रहा है।  वस्तुतः इस प्रकार की बातें से संविधान निर्माताओं का सम्मान नही होता। यब सीधेसीधे उनकी अवमानना  है।    क्योंकि इसका निहितार्थ यह हुआ कि भारत का संविधान इतना कमजोर बनाया गया, जिस पर सात दशकों में ही खतरा आ गया। जबकि खतरा संविधान और आरक्षण पर नहीं, ऐसा राग अलापने वालों की सियासत पर है। संविधान को बचाने की बात भी वही कर रहे है, जिनका अपना सियासी भविष्य दांव पर लगा है। यह राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए हाँथ पैर मारने जैसा है।
    ऐसे लोगों में वह पार्टी भी शामिल है, जो दो दशक तक अपनी एक मात्र प्रतिद्वन्दी पार्टी पर डॉ आंबेडकर की विरोधी होने का आरोप लगाती रही, आज उसी के साथ गठजोड़ हो रहा है। मतलब इनमें अकेले लड़ने की क्षमता नहीं है। पूरी कवायद इसी के मद्देनजर चल रही है। इस लाइन पर भाजपा की भी एक सांसद है। वह भगवा चोला और राजनीति के बीच समन्वय स्थापित करने में विफल दिखाई दे रही है, जातिवाद और राष्ट्रवाद को लेकर भी दुविधा है। वह भी संविधान को बचाने का दावा कर रही है। कितना दिलचस्प है कि उन्हें आम चुनाव के कुछ महीने पहले संविधान पर खतरा दिखाई दे रहा है। कह रही है कि सांसद रहें या न रहे, संविधान बचाएगी। अब उनकी संसद सदस्य्ता बची ही कितने महीने की है। वैसे संविधान पर संकट क्या है, यह उन्होंने स्पष्ट नहीं किया।
    लेकिन ऐसे बयानों से उनकी सियासत का संकट समाप्त होगा, इसकी गारंटी नहीं है। लेकिन जिस संविधान को बनाने में हमारे संविधान निर्माताओं और संविधान के शिल्पी डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने जो मेहनत की थी, उसका अपरोक्ष रूप से अवमूल्यन किया जा रहा है।
    इतना ही नहीं ऐसे बयान विश्व में हमारे संविधान और संविधान की छवि को धूमिल कर रहे है। इतना ही नहीं दलितों को जिस वोटबैंक की राजनीति में ले जाने का प्रयास हो रहा है, वह भी डॉ. आंबेडकर के विचारों के प्रतिकूल है। उन्होंने ऐसी एकता के लिए  निरर्थक और असंभव शब्द प्रयुक्त किये थे। यह भी लिखा था कि इससे उपयुक्त शब्द इस बात के लिए नहीं है। उन्होंने भारत पाकिस्तान विभाजन पर अपनी किताब में इसके ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक सामाजिक कारणों का उल्लेख किया है। राजनीतिक दुर्भावना को तो केवल प्रतिबिंब माना है। उन्होंने राजनीति में आपराधिक तौर तरीकों की भी निंदा की थी। जाहिर है कि डॉ आंबेडकर मजहबी या वोटबैंक की राजनीति के खिलाफ थे।आज उनके नाम पर राजनीति करने वाले ऐसे ही समीकरण बनाने में जुटे है। इसी प्रकार दो अप्रैल के आंदोलन का तरीका डॉ. आंबेडकर के विचारों की अवहेलना है।
    पिछले लोकसभा चुनाव ने अनेक राजनीतिक पार्टियों की जड़ें हिला दी थी। संख्या के हिसाब से उनके अस्तित्व पर ही संकट आ गया था। इस बेकरारी ने उन्हें कभी चैन से बैठने नहीं दिया। तभी से  सरकार के विरोध का तरीका बदला है। इसकी शुरुआत कथित असहिष्णुता अभियान से शुरू हुई थी। अब संविधान पर खतरे की दुहाई दी जा रही है। वस्तुतः खतरा संविधान पर नहीं ऐसे लोगों की सियासत पर है। यदि इस बार भी संख्या में खास इजाफा नहीं हुआ तो इनकी आगे की राह मुश्किल हो जाएगी।
    लेकिन इस रणनीति में आपत्तिजनक तथ्य अधिक है। संविधान पर खतरा बताना सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि वह एसटी एक्ट के खिलाफ नहीं है। विरोध करने वालों ने आदेश को पढा तक नहीं है। कभी कभार इसमें लोगों का स्वार्थ भी छिपा रहता है। कुछ लोगों ने अपने लाभ के लिए समाज को बरगलाया है। सीआरपीसी के प्रत्येक प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद इक्कीस के साथ पढा जाना चाहिए। इसमें जीवन की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। कानून यह नहीं है कि एफआईआर दर्ज होते ही किसी को गिरफ्तार कर लिया जाय। गिरफ्तारी से पहले  कुछ प्रारंभिक तहकीकात कर ली जाए। अपराधियों को सजा अवश्य मिलनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने वास्तविक दोषियो के प्रति कोई रियायत नहीं कि थी । इतना अवश्य कहा था कि कानून ऐसा नहीं होना चाहिए, जो जातियों के बीच नफरत फैलाये। इसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट दो हफ्ते बाद इस याचिका की विस्तृत सुनवाई करेगा। इसके लिए सभी पक्षकारों से लिखित में अपना पक्ष रखने को कहा है ।
    यह वह न्यायिक व्यवस्था है, जिसका प्रावधान संविधान के निर्माता ने किया था। लेकिन न्यायिक निर्णय के विरोध में सड़कों पर दहशत फैलाने की कल्पना उन महापुरुषों ने कभी नही की होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक कहा है कि  डॉ आंबेडकर को राजनीति में न घसीटें। उन्होंने आरोप लगाया कि आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र की स्थापना को यूपीए सरकार ने रोक दिया था। जबकि उनकी सरकार ने इसे चार वर्ष में पूरा कर के दिखा दिया। आंबेडकर के जन्म दिवस की पूर्व संध्या पर  इसे राष्ट्र को समर्पित किया जाएगा। मोदी ने दावा किया कि आम्बेडकर के सम्मान में जितना कार्य उनकी सरकार ने किया, उतना किसी ने नहीं किया है।
    बसपा प्रमुख मायावती लगातार आरोप लगा रही हैं कि केन्द्र सरकार दलित एक्ट को लेकर चिंतित नहीं हैं। अब वह  सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठा रही है। उनका कहना है को इस फैसले से एक्ट कागज का टुकड़ा बन जायेगा। लेकिन 2007 में मायावती सरकार ने भी ऐसा ही शासनादेश जारी किया था। इसके तहत एक्ट के नियमों में ढिलाई दी गई थी। मायावती सरकार ने सैद्धान्तिक रूप में माना था कि इस एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है। इसका दुरुपयोग रुकना चाहिए।
    तत्कालीन मुख्य सचिव ने यह आदेश दिया एससी एक्ट के क्रियान्वयन में विशेष सावधानी बरती जाए। इस एक्ट का सहारा लेकर कतिपय लोग सरकार को बदनाम करने की कोशिश करेंगे। यह भी देखा गया है कि कभी-कभी दबंग व्यक्ति आपसी वैमनस्य के कारण प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर अनुसूचित जाति के व्यक्ति को मोहरा बनाकर झूठा मुकदमा दर्ज करा देते हैं।
    इसलिए ऐसे मामलों में अविलंब सत्यता की पुष्टि करने के बाद मुकदमा दर्ज किया जाए। एक्ट का दुरुपयोग किसी भी दशा में नहीं होना चाहिए। इतना ही नहीं बसपा सरकार ने छोटे मामलों का निस्तारण सामान्य एक्ट मे करने का निर्देश दिया था।
    यह भी कहा गया कि अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्यों के उत्पीड़ने के मामले में त्वरित न्याय दिलाने के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाए कि किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक परेशान न किया जाए। जाहिर है कि जो इंतजाम बसपा सरकार ने किए थे, वही मंशा सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश में है। लेकिन अंधेरगर्दी देखिये, बसपा सरकार ने जो किया उसे सर्वजनहिताय कहा गया, उससे संविधान मजबूत हो गया, उससे डॉ आंबेडकर का सम्मान हो गया।
    सुप्रीम कोर्ट की वैसी ही  मंशा  से एक्ट कागज का टुकड़ा हो गया, संविधान पर खतरा हो गया, आदि। अंततः जैसा प्रदर्शन हुआ, वह भी संविधान को मजबूत बनाना और आंबेडकर के सम्मान में था।
    जाहिर है कि अपने सियासी वजूद को बचाने के लिए संविधान और आंबेडकर के नाम का प्रयोग किया जा रहा है। ऐसी बातों से संविधान और उसके निर्माताओं की अहमियत कम नहीं होगी, लेकिन ऐसी राजनीति करने वालों की असलियत अवश्य सामने आ रही है।
    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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