अब शीतकालीन सत्र की तैयारी

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जीके चक्रवर्ती

संसद के प्रत्येक शीत कालीन सत्र की तरह इस बार भी शीतकालीन सत्र के बुलाए जाने की घोषणा के बाद अब सदन से यही अपे्क्षा है कि सत्तापक्ष व विपक्ष दोनों के मध्य दोनों सदनों में एक सार्थक बहस व चर्चा हो जिसकी कि हम आशा करते हैं।

मौजूदा सरकार संसद के शीतकालीन सत्र से बचने की कोशिश कर रही है, जैसा कि विपक्ष द्वारा उसके ऊपर इस तरह के इल्जाम लगा कर इस बात को एक बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश भी की गई। वही पर अभी पिछले ही दिनों कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक में सोनिया गांधी ने शीतकालीन सत्र की घोषणा में हो रही देर को लेकर मोदी सरकार पर जोरदार हमला करते हुए कहा कि सरकार अपने संवैधानिक उत्तरदायित्व से बचने का प्रयास कर रही है भारतीय जनता पार्टी ने ऐसे आरोपों का तुरंत जवाब भी दिया, इन सब के बावजूद जरुरत इस बात की थी कि शीत कालीन सत्र की तारीख पर शीघ्र से शीघ्र फैसला लिया जाता। इसे एक संतोषजनक बात ही कहेंगे कि केंद्र ने ऐसा करने में तनिक भर की भी देर नहीं की।

उसके इस तरह के इरादेे से विल्कुल स्पष्ट होते देर नहीं लगी कि विपक्षियों द्वारा उठाए जा रहे तरह- तरह के प्रश्नों पर अपने आप विराम लग जाने से इस तरह की तमाम चर्चाएं निराधार ही साबित हुई हैं कि सरकार संसद का सामना करने से बच रही है। यह अलग बात है कि संसद का शीतकालीन सत्र सामान्यत: नवंबर के तीसरे हफ्ते में शुरू हो जाया करता है। लेकिन इससे पहले भी कई बार असामान्य परिस्थितियों या सियासी तकाजों के चलते संसदीय सत्र के समय में परिवर्तन होता रहा है।

इस समय पूरे राष्ट्र का ध्यान गुजरात चुनाव पर टिका है। भाजपा एवं कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के वहां चुनाव प्रचार में लगे होने के कारण इस समय संसद सत्र का आयोजन करना केवल रस्मअदायगी भर ही कहलाता। इस तरह यह तो और भी अच्छी बात है कि अब संसद उस समय बैठेगी, जब गुजरात का मतदान पूर्ण हो चुका होगा। यह जाहिर सी बात है कि उस वक्त पक्ष एवं विपक्ष दोनों के नेताओं का संसदीय कार्यों पर अच्छी तरह ध्यान केंद्रित कर पाने की इस स्थिति में संसद के कार्य और अच्छी तरह से निपटाने में सहायक सिद्ध होंगे। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि यदि गुजरात चुनाव से पहले संसद बैठी तो विपक्ष जरूर सरकार की कथित विफलताओं के मुद्दे को जोरशोर से उठायेगी, इस तरह की बातों का प्रभाव गुजरात के मतदाताओं पर पडेगा चूँकि प्रादेशिक चुनावों में स्थानीय मुद्दों पर मतदाता मतदान करते हैं।

वास्तव में ऐसी सोच रखना ही निरर्थक है कि संसदीय वाद-विवाद का प्रभाव राज्यों के चुनाव नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। संसद की कार्यप्रणाली एवं उसकी भूमिका भारतीय जनता अच्छी तरह से जानती समझती है। इसलिए शीतकालीन सत्र के घोषणा में हुई देरी के पीछेे गलत मंशा के अर्थो में लिया जाना उचित नहीं है। कांग्रेस पार्टी ने यह कहा था कि वह अर्थव्यवस्थाओं से लेकर अनेक क्षेत्रों में सरकार की कथित नाकामियों एवं सत्ताधारी दल के अनेक नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार जैसे कथित आरोपों पर बहस करने की इछुक है। इस पर अब उसके पास ऐसा करने का पर्याप्त अवसर भी होंगे।

अब यह प्रश्न जरूर उठता है कि क्या विपक्षी दल यह वादा करेंगे कि अगले सत्र में हंगामा करने के स्थान पर एक स्वस्थ संसदीय परंपराओं का अनुशरण करते हुए होने वाले बहस मे प्रश्न पूछने तक संयम का परिचय देने के साथ ही साथ क्या विपक्ष के नेता इस तरह के आश्वासन देंगे कि शीत कालीन सत्र के दौरान वे पूरे समय तक सदन में उपस्थित रहकर जिम्मेदारी के साथ एक सार्थक विपक्ष की जिम्मेदारी को बाखूबी निभाएंगे? यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि सत्तापक्ष एवं विपक्ष दोनों के जिम्मेदारीपूर्ण आचरण करने से एक सफल लोकतंत्र के संचालन होने जैसी जिम्मेदारी का निर्वाह करने में कामयाब होंगे। सही समय पर शीत कालीन सत्र की घोषणा कर सरकार ने उसके इरादों पर उठाए गए संशयों, भ्रमों पर से छाए धुंध को हटा देने से अब विपक्ष की सही जिम्मेदारी को निभाना का वक्त है और यह पूरी तरह से उनके ऊपर ही निर्भर करता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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