व्यंग : अंशुमाली रस्तोगी
दीवार पर दर्ज था– “गधा मूत रहा है!” समझ नहीं आता, बलि का बकरा हर दफा गधे को ही क्यों बनाया जाता है? क्या दीवार पर सिर्फ गधा ही मूतता है? कुत्ता भी तो मूतता है. “कुत्ता मूत रहा है” यह क्यों नहीं लिखा जाता? मेरा दावा है, लिखवाने वाले ने गधे को मूतते कभी नहीं देखा होगा. पर एक धारणा बना ली है, गधे को कटघरे में खड़ा करने की.
मूतना एक पवित्र कर्म है. मूत पर इंसान क्या जानवर का भी जोर नहीं. उसे जब जहां जिधर आना है, आएगा. मूत से ज्यादा होशियारी जिंदगी पर भारी पड़ सकती है. दीवारें आखिर होती किसलिए हैं; पोस्टर चिपकाने या फिर मूतने के लिए. मूत दीवारों की बुनियाद को मजबूत करता है. इंसान और जानवर यह नेक फर्ज सदियों से बखूबी निभा रहे हैं.
किशन चंदर ने गधे की आत्मकथा न लिखी होती तो दुनिया जान ही न पाती; गधों का महत्त्व. मैंने कई दफा घर में एक गधा पालने की योजना बनाई. फिर, आईने में अपनी शक्ल देखी और ख्याल छोड़ दिया. मेरे इर्द–गिर्द इतने गधे हैं कि इंसान की जरूरत महसूस ही नहीं होती.
गधे को मूत का प्रयाय बना, उसे जलील न करें. कई बरस पहले एक बड़े कवि के बारे में मैंने सुना था कि वे अपनी पेशाब पर खूब कूदे–फंदे थे. कवि का दिल चंचल होता है. कब क्या कर बैठे, ईश्वर भी नहीं जानता. कवि मूतते रहें. गधे सलामत रहें।







