कुर्सी की चाह प्रियतमा की पप्पी जैसी होती है। एक बार अगर लत लग जाए तो बंदा ना संविधान देखता है, ना संस्कार। उसे हर कोना, हर गली, हर चाय की दुकान बसंत ऋतु की तरह लगती है। ये लत ऐसी है कि आदमी का दिमाग ‘लोकतंत्र’ से ‘लो-तंत्र’ की ओर भी दौड़ पड़ता है। एक समय था जब एक बड़े पत्रकार सुबह से शाम तक टीवी पर ऐसे प्रकट होते थे जैसे साक्षात ज्ञान के देवता।
मगर चैनल से विदा क्या हुए, हर मंच पर चीखने लगे—“टीवी बंद कर दो! यह भ्रामक है, बाजारू है! और फिर अगले ही दिन यूट्यूब पर चैनल शुरू। अब वहीं से प्रवचन देते हुए कहते हैं – Like, Share, Subscribe करिए, नहीं तो लोकतंत्र रो देगा। वहीं हमारे माननीय नेता गण भी कम नहीं। मीडिया से उनका गुस्सा वैसा ही होता है जैसा प्रेमिका का प्रेमी से होता है जब वह बोलती है- जानू! अब मैं तुमसे बात नहीं करूंगी! और अगले ही दिन नेताजी का उसी चैनल पर एक्सक्लूसिव इंटरव्यू। जनता सब जानती है।
आज वह फलाना अखबार न पढ़ने फॅलाना चैनल न देखने की रील बनाए! कल जब नेताजी जी का उसी चैनल पर पॉडकॉस्ट आये या फिर उसी अखबार में तड़कता—भड़कता इंटरव्यू तो नेताजी का क्या होगा तपेगी तो जनता की ही। ऐसे में पड़ोसी सवाल नहीं पूछता है बस देखकर मुस्कुरा देता है। इसलिए जनता सब जानती है इस लोकतांत्रिक नाटक में पत्रकार, नेता, और जनता—तीनों अपने-अपने किरदार में ग़ज़ब का अभिनय कर रहे हैं। पता नहीं निर्देशक कौन है? पप्पी की तरह प्यारी कुर्सी या?
- डॉ. सुयश नारायण मिश्रा







