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    Home»साहित्य

    बदनामियां अच्छी हैं!

    By January 2, 2018 साहित्य No Comments4 Mins Read
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    व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी

    बदनामियां अब दाग जितनी ही अच्छी लगने लगी हैं! एक बार बदनाम हो लिए तो फिर जन्म-जिंदगी भर की ऐश ही ऐश। कहीं भी किसी को अपना परिचय देने की आवश्यकता नहीं। नाम के साथ जुड़ी बदनामी खुद परिचय बन जाती है। हालांकि एकाध दिन थोड़ा बुरा टाइप जरूर लगता है मगर जल्द ही आदत में आ जाता है।

    कुछ बदनामखोर तो मैंने ऐसे भी देखे-सुने हैं जिनका नाम ज़बान पर आते ही अगला थर-थर कांपने लगता है। आगे-पीछे की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। तब मीडिया भी पूरी दिलचस्पी के साथ बदनाम की कथित बदनामी को अपने तरीके से ग्लोरीफाई करता है। फिर बदनामियां पर्सनल न रहकर ग्लोबल हो जाती हैं। ग्लोबल होने में जो सुख है उसका तो आनंद ही कुछ और है। है न…!

    एक वक्त था जब लोग किसी बदमान को अपने पास तो दूर उसकी छाया के करीब जाने से भी घबराते थे। बदनाम के दिखते ही उसके चरित्र पर किस्म-किस्म की लानतें भेजते थे। अपने गली-मोहल्ले में रहने तक नहीं देते थे। मगर अब ऐसा नहीं है! जमाने के बदलने के साथ-साथ लोगों ने अपनी सहनशक्ति को भी काफी स्ट्रांग कर लिया है। चाहे बदनाम हो या अपराधी उनकी हेल्थ पर अब कोई खास फर्क न पड़ता। सब अपने में ही व्यस्त और मस्त रहने लगे हैं। उनके पड़ोस में बदनाम रह रहा है या नाम वाला उन्हें नहीं खबर।

    मैंने तो तमाम लोग ऐसे भी देखे-सुने हैं जो अपना काम निकलवाने के लिए बदनाम का दामन थामने में भी गुरेज नहीं करते। पूछो तो तर्क देते हैं, ईमानदार का हाथ पकड़ने से बेहतर है किसी ऊंचे बदनाम और बिंदास व्यक्ति का हाथ थामा जाए ताकि आड़े वक़्त में वो काम आ सके। चरित्र अब कोई बहुत बड़ा मसला नहीं रह गया है पियारे। देश-दुनिया में सभी बे-चरित्र मौज कर रहे हैं।

    लुत्फ तो यह है कि लोग समाज से कहीं अधिक अब सोशल मीडिया पर बदनाम हो रहे हैं। और तो और सोशल मीडिया पर मिली बदनामी को फुल-टू एन्जॉय भी कर रहे हैं। ‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत यहां पूरी तरह फिट बैठती है। और, जो सोशल मीडिया पर बदनाम नहीं है वो कतई हाशिए पर है।

    सोशल मीडिया से मिली बदनामी के तमाम ऊंचे फायदे हैं। ये बदनामियां बहुत तेजी से ग्लोबलता को प्राप्त होती हैं। अमेरिका से लेकर चीन-जापान-युगांडा तक आपको नाम से कम बदनामियों से ही अधिक जाना जाता है। रात भर में बदनामियों की ख्याति इतनी बढ़ जाती है कि दूसरे लोग भी प्रेणना लेना शुरू कर देते हैं। इतिहास गवाह है, लोग नेकियों से कम अपितु बदनामियों से अधिक सीखते हैं।

    खुद को बदनाम होने देने में फ़िल्म स्टारों का जबाव नहीं। जो फ़िल्म स्टार जितना बदनाम हो लेगा उसकी फ़िल्म भी उतनी ही चलनी है। ये प्रमोशन-फिरमोशन तो महज बहाना है असल मकसद तो खुद से जुड़ी बदनामी को मार्केट करना है। अभी हाल मार्सल को जिस प्रकार बदनाम किया गया, फ़िल्म सुपर हिट का रूतबा पा गई।

    दूसरी तरफ, सोशल मीडिया पर कुछ भी कह-लिख या पहनकर बदनाम हो लो फिर ट्रोलर्स आगे की बदनामी का काम आसान कर ही देते हैं। फ़िल्म में एक दफा हिट का तड़का लगा नहीं कि सारी बदनामियां काफूर! तब न कोई पूछने वाला मिलेगा न कहने वाला कि क्यों और किस बात पर बदनाम हुए थे महाराज।

    आज के जमाने में जिसने अपनी बदनामी को भुना लिया उसकी पौ बारह। बदनामी से हासिल हुए नाम से ही सफलता का रास्ता निकलता है। यही वजह है कि अब लोग अपनी बदनामियों पर शर्मसार नहीं बल्कि गौरवान्वित टाइप फील करते हैं।

    मानना पड़ेगा, चरित्र निर्माण में बदनामियां ही सार्थक भूमिका निभा रही हैं। बाकी आदर्शवाद पर झड़े रहिए कलेक्टरगंज…!

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