गेंदे का फूल देखकर इंदिरा गांधी की जब चढ़ जाती थीं त्योरियां, पूरा स्टाफ सहम जाता था!

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प्रसंगवश:
हमारे देश की आज़ादी से लेकर राजनीति जैसे क्षेत्रों में जितना योगदान पुरूषों का है उतना ही महिलाओं का भी रहा है। यह एक अलग बात है कि देश के आबादी के अनुसार महिलाओं की भागीदारी उतनी नहीं है, जितनी होना चाहिये था लेकिन भारतीय राजनीति में महिलाओं का दखलंदाजी और दबदबा हमेशा से रहा है।
हमारे देश की पहली प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी हो चाहे सबसे कम उम्र में चुनाव लड़ चुकी राखी बिड़ला के अलावा हमारे देश की राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की आज तक वर्चस्व कायम है। भारतीय राजनीति में 15 सबसे ताकतवर महिला राजनेताएं, जिन्होंने देश के भविष्य को संबरा-संभाला ऐसे महिलाओं में से हमारे देश की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी का नाम आता है। इंदिरा गांधी का नाम हमारे देश मे ही नही वल्कि पूरी दुनिया में हुये महान कूटनीतिज्ञों में से भी एक हुआ करता था।
हम आप मे से बहुत कम ही लोगों को शायद यह पता होगा कि भारत की तीसरी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को गेंदे के फूल से ‘एलर्जी’ थी इसलिये उनके व्यक्तिगत स्टाफ़ को उनका सख्त निर्देश था कि कोई भी उनका प्रशंसक उन्हें भेंट स्वरूप देने के लिये गेंदे के फूल लेकर उन तक न पहुँच पाये।
गेंदे के जिस फूल से हमारे भारतीय संस्कृति में पूजा पाठ से लेकर लोगो के स्वागत करने या राजनेताओं के मंच को हमेशा हम सजाने के रूप में उपयोग करते चले आ रहे हैं, उसी गेंदे के फूल को देख कर इंदिरा गांधी अत्यंत नाराज जो जाया करती थीं। यह तो बाता पाना बहुत मुश्किल है कि उन्हें इस फूल से इतनी नफरत कियूं थी लेकिन उनके जिंदगी को नजदीक से जानने देखने वाले या ताल्लुक रखने वाले अन्य महिलाओं में से लेखिका एवं वरिष्ठ पत्रकार द्वारा उन पर लिखी गयी एक बहुचर्चित किताब ‘द मेरीगोल्ड स्टोरी- इंदिरा गांधी एंड अदर्स’ की लेखिका कहती हैं कि उनके स्टाफ़ की सबसे बड़ी जद्दोजहद इस बात को लेकर होती थी कि कहीं कोई भी व्यक्ति गेंदे का फूल लेकर इंदिरा गांधी के नज़दीक न पहुंच जाए।
आदि कोई उनके पास गेंदे का फूल ले जाने में सफल हो भी जाता था तो उनकी त्योरियां चढ़ जाती थीं।’ उनका इस तरह से गुस्से का इज़हार करना उन व्यक्तियों के लिए नहीं होता था, जो उनके लिए फूल लेकर पहुँचे थे, बल्कि अपने स्टाफ़ के ऊपर उनका गुस्सा टूटता था और वह इसलिये कि उनके रहते हुये ये कैसे संभव हुआ।’ और जब कि सबसे बड़ी विडम्बना इस बात के लिये यह था जब इंदिरा गांधी की हत्या हो जाने के पश्चात उनके पार्थिव शरीर को तीन मूर्ति भवन में लोगों के दर्शनों के लिए उनके पार्थीव शरीर के चारो और वही गेंदे के ही फूल थे जिससे उनको शक्त नफरत हुआ करता था।
उनके आत्यमज श्री जवाहरलाल नेहरू की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इंदिरा गांधी की प्रतिदिन सुबह सुबह देश के आम जनता से मुखातिब हुआ करती थी। इसको उनका ‘दर्शन दरबार’ कहा जाता था।
भारत की एक प्रखर ओजस्ववि प्रियदर्शनी नेता को देश ने 31 अक्टूबर वर्ष 1984 को सदा सदा के लिए खो दिया।
प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती

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