यादें असरानी की : बताया यादगार किस्सा
बात उस रात की है जब कोलकाता का नेताजी सुभाष चंद्र ऑडिटोरियम किशोर कुमार की मखमली आवाज के जादू के लिए बेताब था। मंच पर मशहूर हास्य अभिनेता और उस शाम के होस्ट असरानी जी की चिर-परिचित मुस्कान माहौल को और रंगीन बना रही थी। लेकिन स्टेज पर उस वक्त बप्पी लहरी जी धूम मचा रहे थे। गोल्डन चेन, चश्मा, और उनकी चिर-परिचित एनर्जी के साथ बप्पी दा एक के बाद एक गाना गाए जा रहे थे। “बम बम बम, लहराए मेरा झुमका…” से लेकर “प्यार बिन, जीने का मजा…” तक, बप्पी दा माइक को जैसे गले से लगा चुके थे!
लेकिन ऑडियंस की बेचैनी बढ़ रही थी। वो तो किशोर दा की एक झलक, उनकी एक धुन के लिए पागल हो रही थी। तालियाँ धीरे-धीरे “बप्पी जा, बप्पी जा” के नारों में बदल गईं। असरानी जी ने बाद में बताया, “मुझे लगा बप्पी दा को सुनाई नहीं दे रहा, क्योंकि वो तो ये समझ रहे थे कि जनता चिल्ला रही है, ‘बप्पी आ, बप्पी आ!’ और वो और जोश में गा रहे थे!” उधर, बैकस्टेज पर किशोर दा अपनी टहल-टहल में बेचैन हो रहे थे। उनकी आँखों में शरारत और अधीरता का अनोखा मिश्रण था। आखिरकार, उनका सब्र जवाब दे गया।

किशोर दा ने असरानी जी की तरफ देखा, आँख मारी, और बोले, “बस, अब ये मुझ पर छोड़ दे!” माइक थामा, और स्टेज पर ऐसे कदम रखा जैसे कोई बादशाह अपने तख्त की ओर बढ़ रहा हो। फिर शुरू हुआ किशोर दा का जादू! वो गाने लगे, “बप्पी रे बप्पी… ओ मेरे बप्पी…” एक हल्का-सा ठुमका, चेहरे पर शरारती मुस्कान, और ऑडियंस तो जैसे पागल हो गई।
किशोर दा ने गाते-गाते, बड़े प्यार से बप्पी दा का हाथ थामा, उन्हें नाचते-झूमते स्टेज के किनारे तक ले गए, और बड़े अदब से उनकी सीट पर बिठा दिया। ऑडियंस ठहाकों और तालियों से गूँज उठी। बप्पी दा भी हँसते हुए अपनी सीट पर जम गए, और किशोर दा ने माइक संभाला तो माहौल में बिजली-सी दौड़ गई। असरानी जी ने कहा, “उस दिन किशोर दा का ये अंदाज़ देखकर मेरी हँसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।”
एक और मजेदार किस्सा: किशोर दा और असरानी का “गुजराती” कनेक्शन
असरानी जी और किशोर दा का रिश्ता सिर्फ़ मंच तक सीमित नहीं था। जब असरानी ने गुजराती सिनेमा में बतौर डायरेक्टर कदम रखा, तो किशोर दा ने उनकी फिल्म चलो अच्छा हुआ (1972) में गाना गाया। लेकिन इस गाने की रिकॉर्डिंग का किस्सा भी कम मजेदार नहीं है। असरानी जी ने एक इंटरव्यू में बताया कि किशोर दा स्टूडियो में आए तो मूड में थे। गाना था एक हल्का-फुल्का रोमांटिक ट्रैक, लेकिन किशोर दा ने गाने से पहले असरानी जी से पूछा, “ए असरानी, ये गाना गुजराती में गाऊँ या हिंदी में?” असरानी जी हँस पड़े और बोले, “किशोर दा, आप तो बस गाइए, आपकी आवाज़ में तो गुजराती भी हिंदी जैसी लगेगी!”
किशोर दा ने फिर रिकॉर्डिंग शुरू की, लेकिन बीच में अचानक रुक गए और बोले, “अरे, असरानी, इसमें थोड़ा मज़ा डालते हैं!” फिर क्या, उन्होंने गाने में अपनी खास “योडलिंग” डाल दी, जो उस समय गुजराती फिल्मों में बिल्कुल नया था। असरानी जी तो हैरान! गाना रिलीज़ हुआ तो दर्शकों ने खूब पसंद किया, और असरानी जी ने किशोर दा को गले लगाकर कहा, “आपने मेरी फिल्म को अमर कर दिया!” किशोर दा बस अपनी शरारती हँसी के साथ बोले, “अरे, बस थोड़ा मज़ा किया!” इस तरह, किशोर दा का मस्तमौला अंदाज़ और असरानी जी की हाजिरजवाबी ने कई यादगार पल दिए।







