कौन -कौन मॉनसून के बादल कमजोर बता रहा है?
अरे भाई वह कोई हत्यारा, अपराधी, माफिया या कोई भाई नहीं है कि पता नहीं कहां जाकर छुप गया? पुलिस, प्रशासन, सरकार, खुफिया एजेंसियां, पूरा का पूरा तंत्र उसका पता ही नहीं लगा पा रहा कि कहां गायब हो गया? बैंकों का पैसा लेकर भागने वालों का तो फिर भी पता चला गया कि कौन इंग्लैंड में बैठा है, और कौन एंटीगुआ में? पर इसका पता नहीं चल रहा है कि कितना है, और कहां है। यह काला धन है, कोई दुर्घटनाग्रस्त हुआ विमान तो नहीं है।
दुर्घटनाग्रस्त विमान के बारे में तो फिर भी इस तरह के कयास लगाए जा सकते हैं कि हो सकता उसे एलियंस ले गए हों। ऐसे में सच में हमारे टीवी चैनलों को इसके बारे में भी कुछ तो नवोन्मेषी कयास लगाने ही चाहिए। कहीं एलियंस न ले गए हों। और हम अपने बैंक खाते टटोलते रहें कि आया कि नहीं।

मॉनसून के बादल भी इस बार तो कमजोर ही बता रहे हैं। घनी काली घटाएं छायी होतीं तो संतोष होता कि राडार पर नहीं आ रहा होगा। हालांकि पांच साल हो लिए जब इसके आने का, कान पकड़कर या उठाकर लाने का इतना शोर मचा था कि हम खुशी से तालियां पीट रहे थे कि आ रहा है, आ रहा है। आए तो खैर बैंकों के भगोड़े भी नहीं। पर जैसे उनके आने की उम्मीद है, वैसे ही इसके आने की उम्मीद भी हमने छोड़ी नहीं है। हमने और पांच साल इंतजार करने की ठान ली है।
पर इधर हमने पांच साल इंतजार करने की ठानी और उधर संसद की वित्तीय मामलों संबंधी स्थायी समिति ने कह दिया है कि काले धन का पता लगाने का कोई तरीका नहीं है। धरती के गर्भ में छिपी खनिज संपदा का तो पता लगाया जा सकता है कि कहां और कितनी है, पर काले धन का नहीं है। अब तो सुनामी का भी पता लगाया जा सकता है।
कमाल तो यह है कि हमने मंगल ग्रह पर छिपी गैस का तो पता लगा लिया पर काले धन का पता लगाने का कोई तरीका नहीं है। कोई कहता है कि यह कोई दस लाख करोड़ हो सकता है, तो कोई इसे बीस-तीस लाख करोड़ तक ले जा रहा है। और जब यही पता नहीं लगाया जा सकता कि यह कितना है, तो यह कैसे पता चलेगा कि यह कहां है? फिर किसका है यह पता लगाने का तो सवाल ही नहीं। ऐसे में इसके आने की उम्मीद लगाना बेकार है। छोड़ो न यार, बहुत इंतजार कर लिया। चलो, कोई और शगल पालें।







