फैक्ट्री में मरने वाले मजदूरों के परिवारों की जिम्मेदारी कौन लेगा?

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 मौत की फैक्ट्री में सस्ती जानों का अंत

43 लोगों की तरह आग की लपटों में जान गवाने वाला एक था मुशर्रफ़। जिस वक्त उसके सामने मौत खड़ी थी उस वक्त अपने बचपन के दोस्त मोनू अग्रवाल से मोबाइल फोन पर बात करते मुशर्रफ की आवाज का आडियो वायरल हुआ। सुन कर सबका कलेजा कांप गया। इस कंपन ने तमाम छुपे हुए सच के अहसासों को जगा दिया।

बता दें कि दिल्ली की अनाजमंडी में बीते रविवार सुबह एक फैक्ट्री में भीषण आग लगने से 43 लोगों की जान चली गई। मरने वाले मजदूर थे जिनमें से अधिकतर यूपी और बिहार के थे। इस भयानक हादसे ने दिल्ली में 13 जून, 1997 के उपहार हादसे की याद ताजा करा दी जिसमें ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में आग की घटना से 59 लोगों की जान चली गई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। अभी इसी साल करोलबाग के होटल में भी आग लगने से 14 लोगों की मौत हुई थी। इसके अलावा भी ऐसे छिटपुट हादसे होते रहते हैं जिनमें लोगों की जान जाती है।

पता चला है कि अनाजमंडी की जिस इमारत में आग लगी, वहां अवैध रूप से कारखाना चल रहा था जिसमें प्लास्टिक और कागज से चीजें बन रही थीं। आग लगने की वजह बिजली के तारों का गरम होकर जल उठना बताया जा रहा है। हालांकि इसकी वजह कोई दूसरी भी हो सकती है क्योंकि बिजली के मीटर तो सही हालत में पाए गए हैं। अभी तो इसकी छानबीन चल रही है।

बताया जा रहा है कि आग लगने के समय कारखाने की सभी खिड़कियां और दरवाजे बंद थे, इसलिए ज्यादातर लोगों की मौत दम घुटने से हुई। जो लोग बाहर नहीं निकल पाए वे झुलस गए। वैसे अभी तक दिल्ली में जो भी बड़ी आग लगने की दुर्घटनाएं हुईं हैं, वे चाहे अवैध रूप से चलाए जा रहे कारखानों में हों या किसी होटल या बाजार आदि में, सबकी वजह यही देखी गई कि इस तरह छोटे पैमाने पर चलाए जाने वाले कारखानों में अक्सर आग लगने या भूकंप आदि की स्थितियों में सुरक्षा मानकों के लिहाज से निकास, अग्निशमन यंत्र, बिजली के तारों आदि पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता। जाहिर है कि संबंधित महकमे इस तरह की लापरवाहियों की अनदेखी करते हैं या फिर सांठगांठ या रुतबे के चलते उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करते।

प्रशासन की लापरवाही वहां भी दिखती है जहां बहुत से कारखाने सघन रिहाइशी इलाकों में चलते रहते हैं, जहां यदि किसी इमारत में आग लग जाए तो वह बड़े हादसे में तब्दील हो जाती है। अनाजमंडी के इस हादसे में भी कारखाने के मालिकों और प्रशासन की इसी लापरवाही की वजह से 43 लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे। देश की राजधानी में हो रहे ऐसे भयानक हादसे बेहद चिंताजनक और विचलित करने वाले हैं। अब इस तरह के हादसे दुहराए न जा सकें, इसलिए अब केंद्र और दिल्ली सरकार दोनों की जिम्मेदारी है कि दोनों सरकारें मिलकर दिल्ली के ऐसे कारखानों को लेकर कोई व्यावहारिक नीति बनाएं।

  • जी के चक्रवर्ती 

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