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    मायावती की दहाड़ तय करेगी उत्तर प्रदेश की सियासत का रुख

    ShagunBy ShagunOctober 9, 2025Updated:October 9, 2025 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    Post Views: 655

    नवेद शिकोह

    रमाबाई अंबेडकर मैदान स्थित मान्यवर कांशीराम स्मारक स्थल के खूब बड़े मैदान में अर्से बाद बसपा सुप्रीमो मायावती की दहाड़ उत्तर प्रदेश की सियासत का रुख तय करेगी। मान्यवर कांशीराम की पुण्यतिथि पर महासंकल्प रैली का वास्तविक संकल्प क्या होगा ? सत्ता हासिल करना, किंगमेकर बनना, सत्ता को नियंत्रित करना, किसी को हराना या किसी को जिताना ?

    9 अक्टूबर का नीला आकाश गवाही देगा कि मान्यवर कांशीराम की पुण्यतिथि पर राशन नहीं शासन का संकल्प लेने वालों ने विशाल मैदान को कितना नीला किया है। यही मौका होगा जब बसपा का हाथी तय करेगा कि यूपी की सियासत का ऊंट किस करवट बैठेगा।

    एनडीए और इंडिया के अलावा यूपी में बसपा तीसरी ताकत बनकर उभरी तो इसका किसको नुकसान होगा या किसको फायदा होगा, ये बड़ा प्रश्न है। बड़ी जिज्ञासा इस बात की भी है कि बसपा अपनी पुरानी ताकत में आकर सत्ता का संघर्ष करेगी और त्रिकोणीय मुकाबले में आ जाएगी या विपक्ष को कमजोर कर सत्तारूढ़ भाजपा के लिए फायदेमंद साबित होगी ?

    अथवा गठबंधन के इस सियासी दौर में एकला चलो की जिद छोड़कर किसी गठबंधन में आने या कोई गठबंधन बनाने के संकेत देगी ! तमाम सवालों के सांकेतिक जवाब बसपा की महासंकल्प रैली से मायावती के रुख से पता चल जाएंगे।

    बसपा को पुनर्जीवित करने, आकाश आनंद को रिलांच करने और पार्टी के चुनावी टिकट की काफी छोटी हो चुकी कतार को बढ़ाने की संभावनाओं वाली रैली में भाजपा का पर्दे के पीछे से क्या रोल होगा ? योगी सरकार, प्रशासन कितना सहयोग/असहयोग करता है ये भी देखना होगा। समाजवादी पार्टी ने बसपा को प्रतिद्वंद्वी मानते हुए रैली के दिन जिलों में कांशीराम जी की स्मृति सभाएं आयोजित की हैं। बसपा की रैली पर भाजपा का रिएक्शन क्या है ये भी देखना होगा।

    मुख्य ग़ौर करनी वाली बात तो ये होगी कि रैली – “राशन नहीं शासन चाहिए” थीम पर ही आधारित हो, बसपा सुप्रीमो मायावती सिर्फ सत्ता के खिलाफ जंग का एलान करें और अपने पारंपरिक वोट बैंक दलित समाज की बसपा में वापसी की इमोशनल अपील करें तो ये सत्तारूढ़ भाजपा के लिए खतरे की घंटी और 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबले का संकेत होगा। हांलांकि ऐसी संभावना कम है। सत्तारूढ़ भाजपा से अधिक सपा-कांग्रेस पर हमलावर होने और दलितों से ज्यादा पिछड़ों -मुसलमानों को अपने पाले में लाने पर ज्यादा बल दिया तो बसपा को भाजपा की बी टीम के आरोप का टैग गहरायेगा। और इस रैली को भाजपा प्रायोजित कहने के आरोपों को बल मिलेगा।

    यदि मायावती पार्टी को पुनर्जीवित करना चाहती हैं तो उन्हें सबसे पहले अपने दलित वोट बैंक की वापसी पर जोर देना होगा। दलित विरोधी बताते हुए सत्ता के प्रति आक्रामकता दिखानी पड़ेगी। दलित की वापसी शुरू हुई तो मुस्लिम खुद ब खुद बसपा को सपा से बेहतर विकल्प मान लेगा। दलित-, मुस्लिम का कॉम्बीनेशन मजबूत हुआ तो गैर यादव पिछड़ी जातियां और अपर कास्ट भी सत्ता की संभावना देखकर जुड़ेंगा। लेकिन ये दूर की कोड़ी है पहले तो बसपा को भाजपा जा चुके दलित वर्ग की वापसी के प्रयासों पर केंद्रित होना होगा। मुस्लिम समाज भी यही चाहता है कि बसपा का आधार कम से कम 80-90 फीसद दलित समाज से मजबूत हो तो सपा से अधिक वरियता बसपा को दी जाए। किंतु दलितों की वापसी के बजाय मुस्लिम समाज पर ही डोरे डालने, मुस्लिमों को अधिक टिकट देने या मुसलमानों द्वारा बसपा को वोट ना देने के शिकवे- शिकायते करने से ही बसपा को वोट कटवा और भाजपा की भी टीम जैसी तोहमतें लगती रही हैं।

    माना जाता है कि मायावती भाजपा का मुकाबला करने वाले सपा को कमजोर करने और भाजपा को मजबूत करने के लिए बसपा मुस्लिम वोटों का बंटवारा करनी की रणनीति अपनाती है। ऐसी तोहमतें ही बसपा को दिन पर दिन और भी कमजोर किए जा रही हैं। मुस्लिम समाज हमेशा-हमेशा से भाजपा को हराने की स्थिति वाले दल का समर्थन करता रहा है, पर इधर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बुलडोजर कल्चर और डेंट-पेंट करने जैसे कड़े बयानों से मुस्लिम समाज और भी ज्यादा लामबंद हुआ है। इस समाज में एकजुट होकर अधिक से अधिक वोट देने की भावना जागृत हुई है।

    मोदी योगी युग में खासकर यूपी में मुस्लिम इलाकों में नब्बे फीसद तक वोट पड़ने लगे हैं। वोटों का बटवारा या बिखराव भी अब नहीं होता। बसपा का जनाधार बहुत घटता जा रहा है और सपा भाजपा से सीधा मुकाबला करती नजर आती है इसलिए यूपी में बीस फीसद वाला सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग थोक मे समाजवादी पार्टी का समर्थन करने लगा है। मुस्लिम समाज में चुनावी रणनीति तय करने वाले दानिशमंदों का कहना है कि बसपा बात बात में मुसलमानों के समर्थन की बात करती है, जबकि सपा मुस्लिम मामलों पर ज्यादा बयानबाजी नहीं करती,फिर भी अकलियत की पसंद सपा है।

    कारण ये है कि मुसलमान चाहता है कि उसके हित में ये होगा कि भाजपा विरोधी दल मुस्लिम समाज की बात किए बिना हिन्दू समाज का अधिक से अधिक वोट हासिल करे, और जिसके पास अधिक से अधिक बहुसंख्यक वोट होगा उसके समर्थन के लिए मुस्लिम समाज एकजुट हो जाएगा। इसलिए बसपा की महासंकल्प रैली में यदि मायावती केवल दलित समाज की वापसी का प्रयास करती नजर आएंगी तब तो अकलियत का बसपा के प्रति विश्वास जगेगा। किंतु यदि दलित समाज से अधिक मुस्लिम और पिछड़ी जातियों पर बसपा सुप्रीमों बल देंगी तो भी टीम के परसेप्शन के रंग धुंधले नहीं पड़ सकेंगे। और इस रैली को अखिलेश यादव के पीडीए को कमजोर करने वाली भाजपा प्रायोजित रैली बता दिया जाएगा।

    हांलांकि ये सच है कि कांशीराम जी ने बसपा स्थापना के साथ दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक समाज को एकजुट कर सर्वप्रथम पीडीए का फार्मूला बनाया था। इस बात के मद्देनजर तो मायावती का पिछड़ों और मुस्लिम समाज को अपने पाले में लगने की कोशिश जायज है, पर जब जड़ें मिट्टी के बाहर आ गईं हों तो पहले कमजोर जड़ों को मजबूत करना होगा। यानि दलितों की वापसी हुई तो मुस्लिम और पिछड़ी जातियों की टहनियां -पत्तियां नजर आने लगेंगी।

    2007बसपा की सफलता और विफलता का वर्ष था जब पार्टी ने सर्वजन हिताय और हाथी नहीं गणेश है जैसे नये विचारों के साथ यूपी में पहली बार बहुमत की सरकार बनाई थी। शायद इस सफल प्रयोग के साथ ही बसपा ने विफलता की खाई में डूबना शुरू कर दिया था। सर्वजन हिताय में दलित समाज को अन्य दलों और बसपा में कोई खास फ़र्क नजर नहीं आने लगा। और दलित समाज का एक बड़ा वर्ग पहली बार बसपा का साथ छोड़कर भाजपा के साथ चला गया। बसपा हाशिए पर आ गई। शायद इसीलिए कांशीराम कहते थे उनका मकसद सत्ता से ज्यादा सत्ता पर नियंत्रण करना है। मजबूत नहीं मजबूर सरकार होना चाहिए। ज्यादा मजबूत सरकार से पूंजीवाद और सामंतवादी ताकतें बढ़ती हैं और वंचित, गरीब, कमजोर आम जनमानस और भी कमजोर होता जाता है।

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