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    Home»अलर्ट

    कोरोना की तबाही में क्यों लागू हो रही संशोधित मीडिया नीति?

    ShagunBy ShagunJuly 26, 2020 अलर्ट No Comments6 Mins Read
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    नवेद शिकोह

    कोराना के मुश्किल दौर में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की संशोशित ‘मीडिया नीति 2020’ एक अगस्त से लागू होने जा रही है। ये देश के हज़ारों मझौले अखबारों को महा कोरोना बन कर डराने लगी है। हिन्दी पट्टी के सार्वाधिक अखबारों वाले उत्तर प्रदेश में इसका सबसे अधिक खौफ है। इस सूबे से प्रेस कॉउन्सिल ऑफ इंडिया के सदस्य संशोधित नीति के खिलाफ बगावती तेवर दिखा रहे है। मंझोले अखबारों पर लटकटी तलवार से प्रदेश की राजधानी के लगभग एक हजार राज्य मुख्यालय के मान्यता प्राप्त पत्रकारों में सैकड़ों पत्रकारों की मान्यता भी खतरे में पड़ सकती है। इसलिए यहां पत्रकार मीडिया संगठनों के नेताओं पर दबाव बना रहे हैं कि वो संशोधित मीडिया नीति के खिलाफ आवाज उठायें।

    इस संशोधित नीति के तहत पच्चीस से पैतालिस हजार के बीच प्रसार वाले पत्र-पत्रिकाओं को आर.एन.आई. या एबीसी की जटिल जांच करानी होगी। इस जांच में मंहगी वेब प्रिंटिंग मशीन, न्यूज प्रिंट(अखबारी क़ागज) और इंक इत्यादि की डिटेल, कार्यालय स्टॉफ, पीएफ, प्रसार डिस्ट्रीब्यूशन के सेंटर आदि का विवरण देना होगा। कम संसाधन वाले संघर्षशील समाचार पत्रों के लिए ऐसी अग्नि परीक्षा देना मुश्किल है।

    उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में अखबारों के पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यता के लिए पच्चीस हजार से अधिक प्रसार होना ज़रूरी है। यदि मंझोले अखबार जांच से बचने के लिए अपने अखबारों का प्रसार पच्चीस हजार से कम करके लघु समाचार पत्र के दायरे में आ जाते हैं तो ऐसे अखबारों के सैकड़ों पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यता समाप्त हो जायेगी। इसलिए यूपी के मीडिया संगठनों पर प्रकाशक और पत्रकार ये भी दबाव बना रहे हैं कि वे योगी सरकार से प्रेस मान्यता के मानकों को संशोधित करवाना का आग्रह करें। ताकि संशोधित मीडिया नीति के तहत जांच से बचने के लिए मझोले वर्ग से लघु समाचार पत्र के दायरे में आने वाले समाचार पत्रों के पत्रकारों की मुख्यालय मान्यता बच जाये।

    इन तमाम घबराहट, बगावत, सियासत और विरोध के बीच प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य अशोक नवरत्न और रज़ा रिज़वी केंद्र सरकार के सूचना एंव प्रसारण मंत्रकालय के फैसले के खिलाफ प्रकाशकों और पत्रकारों के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।

    कुछ मीडिया संगठनों ने भी संशोधित नीति का विरोध करना शुरु कर दिया है। इसे छोटे अखबारों को खत्म करने की साजिश बताया जा रहा हैं।

    चर्चा ये भी है कि देश के चंद बड़े अखबारों ने स्थानीय अखबारों को खत्म करने के लिए ऐसी साजिश रची है। सोशल मीडिया पर प्रकाशकों और कलमकारों का विरोध मुखर हो रहा है-

    हर क्षेत्र की बड़ी ताकतें होती हैं। ऐसी शक्तियां अपने क्षेत्र की संघर्षशील प्रतिभाओं को उभरने नहीं देना चाहतीं। जैसा कि उभरते हुए फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह की आत्महत्या की वजह के पीछे फिल्म उद्योग की बड़ी ताकतों को शक की निगाहों से देखा जा रहा है।

    ताकत की ताकत से दोस्ती होती है। बड़ी मीडिया इंडस्ट्रीज की हर सरकार से दोस्ती रही है। दोस्त दोस्त के काम भी आता है। इन दिनों कोरोना काल की तबाही में तबाह होती हर इंडस्ट्री की तरह मीडिया की अखबारी खर्चीली ब्रॉड इंडस्ट्री बुरी तरह आर्थिक मंदी का शिकार है। कई संस्करण बंद कर दिए, पेज भी कम कर लिए। छंटनी कर ली। वेतन आधा कर दिया। कांट्रेक्ट पर काम कर रहे मीडियाकर्मियों का रिनिवल बंद कर दिया। कॉस्ट कटिंग और छट्नी की तलवाल भी चला दी, लेकिन फिर भी कमाई के मुख्य द्वारा लगभग बंद हैं। वजह साफ है। मीडिया में सरकारी और गैर सरकारी विज्ञापन ही अर्निंग के दो रास्ते होते हैं। कोरोना की चपेट में ये आधे हो गये हैं। सरकार आने वाले समय में विज्ञापन जैसे खर्चों का खर्च और भी कम कर सकती है। गैर सरकारी विज्ञापन आधे से भी कम हो गया है। कार्पोरेट के कामर्शियल विज्ञापनों से लेकर वर्गीकृत विज्ञापन बेहद कम हो गये हैं।

     

    अब कैसे अपने बड़े खर्च पूरे करें ! कैसे विज्ञापन का स्त्रोत बढ़ायें ! इस फिक्र में बड़े ब्रॉड अखबारों को एक रास्ता सूझा होगा !

    विज्ञापनों के बजट का आधे से ज्यादा हिस्सा छोटे लोकल अखबारों के हिस्से में चला जाता है। ये खत्म हो जायें या लघु वर्ग में पंहुचकर इनकी विज्ञापन दरें बेहद कम हो जायें तो सरकारी विज्ञापन के अधिकांश बजट पर बड़े अखबारों का कब्जा हो जायेगा। ये डूबते को तिनके का सहारा होगा।
    शायद इसी लिए ही देश के बड़े मीडिया समूहों के दबाव में इस कोरोना काल के तूफान में भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय संशोधित मीडिया पॉलिसी लागू कर रहा है।

    नहीं तो ऐसे वक्त में जब पीआई बी में नियमित अखबार जमा होने का सिलसिला तक चार महीने से रुका है। आर एन आई ने तीन महीने विलम्ब से एनुअल रिटर्न का सिलसिला शुरू किया।
    देश में सबकुछ अस्त-वयस्त है। पुराने जरूरी रुटीन काम तक बंद है। सूचना मंत्रालय के अधीन कार्यालय में ही कोरोना संक्रमण से बचाव के मद्देनजर शेडयूल वाइज थोड़े-थोड़े कर्मचारी बुलाये जाते हैं। ऐसे में देश के सैकड़ों अखबारों और सैकड़ों कर्मचारियों को फील्ड में निकल कर इकट्ठा होने का नया काम देने वाली नई संशोधित मीडिया पॉलिसी को हड़बड़ी में लागू करने का क्या अर्थ है !

    नियमानुसार मीडिया पॉलिसी संशोधन से पहले प्रेस कॉउन्सिल ऑफ इंडिया की सहमति लेना जरुरी होती है, किंतु कौंसिल के सदस्य आरोप लगा रहे हैं कि इस संबंध में उनसे परामर्श के लिए कोई बैठक तक नहीं हुई।

    उत्तर प्रदेश से कौंसिल के सदस्य सवाल उठा रहे हैं कि कोरोना काल में कम संसाधन वाले संघर्षशील समाचार पत्र जो पहले ही आर्थिक तंगी से बेहाल हैं ऐसे में उनपर जांच थोपने का क्या अर्थ है।

    ऐसे में देश के कोरोना काल में मध्यम वर्गीय समाचार पत्रों के प्रकाशकों को एक नया कोरोना डराने लगा है। कोविड 19 वाले कोरोना वायरस की चपेट वाले तीन फीसद को जान का खतरा और 97% को ठीक होने की उम्मीद होती है। लेकिन यहां अखबार के प्रकाशकों को जिस नये कोरोना का डर सता रहा है उसमें 97% को खत्म हो जाने का डर है।

    पब्लिशर्स को डराने वाले कोरोना संशोधित मीडिया पॉलिसी के अंतर्गत मंझोले वर्ग के प्रसार वाले पत्र-पत्रिकाओं को निर्देश दिया गया है कि इन्हें आर.एन.आई या ए बी सी की जटिल जांच की अग्नि परीक्षा से ग़ुजरना होगा। तब ही मध्यम वर्गीय प्रसार संख्या वर्ग में सरकारी विज्ञापन की दर बर्करार रहेगा, अन्यथा इनकी डीएवीपी की मान्यता समाप्त कर दी जायेगी। जांच ना कराने की स्थिति में प्रकाशकों के पास एक मौका है। वो पच्चीस हजार के ऊपर के प्रसार का दावा छोड़कर पच्चीस हजार के अंदर प्रसार का ही दावा करें। यानी लघु समाचार के वर्ग में आकर वो कम विज्ञापन दरों में ही संतोष करे, अन्यथा जांच करायें। जो ज्यादातार प्रकाशकों के लिए मुम्किन ही नहीं नामुमकिन है। इसलिए प्रकाशक कह रहे हैं कि जांच का ये कोरोना हमें मार देगा!

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