यादें-2019: राम मंदिर विवाद के मुद्दे का हुआ अंत, अयोध्या में जीत गए राम

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फैजाबाद में अयोध्या के राम मंदिर पर हमारे देश के रानीतिक नेताओं द्वारा पैदा की गयी केवल रानीतिक ही नही वल्कि यह मुद्दा ऐतिहासिक और सामाजिक-धार्मिक विवाद से भी जुड़ा हुआ था, जो वर्ष 1990 में सबसे जोरदार तरीके से उभर कर सामने आया था।
 
इस विवाद के मूल में एक मुख्य मुद्दे के रूप में राम जन्म भूमि एवं बाबरी मस्जिद की स्थिति को लेकर था। इस विवाद के जड़ में केवल एक ही बात यह थी कि क्या हिन्दू मंदिर को ध्वस्त कर वहां मस्जिद बनाया गया या मंदिर को मस्जिद के रूप में बदल दिया गया।
 
 
ऐतिहासिक कैलेंडर के अनुसार बाबरी मस्जिद को एक राजनीतिक रैली के दौरान नष्ट कर दिया गया था, जो 6 दिसंबर 1992 को एक दंगे के रुप में परिवर्तित हो गया था। जो संगठन राम मंदिर के निर्माण का समर्थन कर रहे थे, उन्होंने वर्ष 1992 के दिसंबर माह में एक कारसेवा का आयोजन कर लोग को राम मंदिर के निर्माण में श्रमदान के लिए संगठित किया इस तरह वहां लोग एकत्रित हुए थे, बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में भूमि शीर्षक का मामला दर्ज किया गया था, जिसका फैसला 30 सितंबर 2010 को सुनाया गया था। फैसले में, तीन न्यायाधीशों इलाहाबाद उच्च न्यायलय  ने फैसला दिया कि अयोध्या की 2.77 एकड़ (1.12 हेक्टेयर) भूमि को तीन भागों में विभाजित किया जाएगा, जिसमें 1⁄3 राम लल्ला या हिन्दू महासभा द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाना था, 1⁄3 सुन्नी वक्फ बोर्ड एवं शेष के 1⁄3 निर्मोही अखाड़ा को दिया जाना था।
 
9 नवंबर, 2019 को, मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले फैसले को निरस्त कर दिया और कहा कि भूमि सरकार के कर रिकॉर्ड के अनुसार है। उसने हिंदू मंदिर के निर्माण के लिए भूमि को एक ट्रस्ट को सौंपने का आदेश देते हुये राज्य सरकार को मस्जिद बनाने के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को वैकल्पिक 5 एकड़ जमीन देने का भी आदेश दिया। इस तरह से वर्षो पुराना उलझा हुआ मामला सुलझा लिया गया।

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