वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव की कलम से

1998 की बात है। विधु विनोद चोपड़ा अपनी फ़िल्म ‘क़रीब’ के प्रमोशन के लिए फ़िल्म के कलाकारों बाॅबी देओल और शबाना रज़ा ( जो अब नेहा नाम से मनोज वाजपेयी की पत्नी हैं) के साथ दिल्ली आए थे। परिंदा और 1942 ए लव स्टोरी की कामयाबी के बाद उनकी गिनती बड़े निर्माता निर्देशकों में होने लगी थी। बातचीत के दौरान फ़िल्म की सफलता की संभावना पर पूछे गये सवाल के जवाब में उन्होंने थोड़ा झल्लाते हुए कहा-मुक़ाबले में तो यमराज है।
जनता जनार्दन की मेहरबानी से बाक्स आॅफिस का गणित कुछ ऐसा बैठा कि 25 करोड़ की लागत से बनी क़रीब फ्लॅाप हो गई और यमराज हिट हो गई। ये था मिथुन चक्रवर्ती नाम की पहेली का करिश्मा।
पहेली इसलिए कि एक तरफ़ समानांतर सिनेमा के दिग्गजों मृणाल सेन, बुद्धदेव दासगुप्ता, गौतम घोष और मणिरत्नम के साथ की गई फ़िल्में हैं जहाँ अभिनेता मिथुन के अभिनय की गहराई का पता मिलता है, तो दूसरी तरफ़ चांडाल, जल्लाद, यमराज, रावण राज जैसी कूड़ाछाप लेकिन कमाऊ फिल्में हैं। और इन सबके बीच है दर्जनों ऐसी फ़िल्में जिनमें पारिवारिक सिनेमा से लेकर ढिशुम-ढिशुम टाइप सुपरहिट फ़ार्मूला सिनेमा शामिल है।
मिथुन चक्रवर्ती शायद इकलौते ऐसे अभिनेता होंगे जिन्हें रामकृष्ण परमहंस की भूमिका में देखकर मुग्ध भाव से प्रशंसा करने वाला दर्शक रावण राज जैसी फ़िल्म देखकर गालियाँ निकालने लगता है- क्या बकवास है।
अस्सी के दशक में उनका ज़बरदस्त जलवा था। मिथुन ग़रीबों के अमिताभ बच्चन कहलाते थे। ग़रीब माने दर्शक नहीं- ग़रीब माने छोटे-मझोले फ़िल्म निर्माता-निर्देशक। ये सही भी था। बी सुभाष, रवि नगाइच, उमेश मेहरा, राज सिप्पी बापू, बापैया, टी वी प्रसाद जैसों के साथ मिथुन ने अपने ब्रांड का सुपरहिट सिनेमा दिया। तब सिंगल स्क्रीन सिनेमा ही होता था। छोटे बड़े शहरों के तमाम सिनेमा हाल मिथुन चक्रवर्ती की फ़िल्में हफ़्तों तक दिखाते रहते थे। मुझे याद है लखनऊ के मेफ़ेयर, बसंत , नावेल्टी जैसे सिनेमाघरों के अलावा शिल्पी, लिबर्टी और जय भारत जैसे सिनेमाघरों में एक साथ उनकी फ़िल्में चला करती थीं।
बी सुभाष की डिस्को डांसर ने तो उनको रूस तक में ऐसी लोकप्रियता दिलाई जो उनसे पहले सिर्फ राजकपूर को हासिल हुई थी।
डिस्को डांसर का असर हमें शहर की शादियों में सबसे ज़्यादा दिखता था। लड़की वालों के दरवाज़े पर पहुँचने से पहले और नागिन डाँस वाले पटाक्षेप से ऐन पहले तक उलट-पलट कर आई एम ए डिस्को डांसर पर बार बार जम कर नाच होता था। घर-परिवार, रिश्तेदारी-मोहल्ले में कोई न कोई होनहार समारोहों में मिथुन चक्रवर्ती जैसी हेयर स्टाइल, चुस्त सफ़ेद क़मीज़ और उससे भी टाइट पैंट पहन कर सफ़ेद जूतों के साथ नज़र आता था। मिथुन अपने दौर में कल्ट फ़िगर थे- एल्विस प्रिस्ले, जान ट्रेवोल्टा, शम्मी कपूर की तरह।
मणिरत्नम की गुरू में मिथुन का किरदार रामनाथ गोयनका पर ढाला गया था। ओ माई गाॅड का स्त्रैण सा पाखंडी धर्मगुरू श्री श्री रविशंकर की याद दिलाता है।
मुझे उनकी शुरुआती फ़िल्मों में ‘सितारा’ बहुत अच्छी लगी थी । मेफ़ेयर सिनेमा में देखी थी। उसका गाना- थोड़ी सी ज़मीं, थोड़ा आसमां अब भी सुनकर अच्छा लगता है।
अमिताभ बच्चन की अग्निपथ में निभाया उनका कृष्णन अय्यर का किरदार बहुत प्यारा था। मेरा पसंदीदा । ठीक वैसे ही जैसे तहादेर कथा का स्वतंत्रता सेनानी शिवनाथ जो विस्तृति और वर्तमान के बीच के द्वंद्व की अभिव्यक्ति में आपको भावुक कर जाता है।
मैंने जानबूझ कर यहाँ उनकी राजनीतिक पारी को छोड़ दिया है। वहाँ का कुल हासिल उनके खाते में विवाद और विफलता ही है।







