संवाददाता समिति के चुनाव में ताल ठोकेंगे दो सौ पत्रकार
लखनऊ, 06 जनवरी। पत्रकारों का हब कहे जाने वाले यूपी के सबसे बड़े पत्रकार संगठन “उ. प्र.मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति” के पदाधिकारियों को बाकायदा चुनाव के माध्यम से राज्य मुख्यालय के पत्रकारों द्वारा चुना जाता है। एक जमाने में इस समिति की बड़ी कद्र थी। सरकारों और पत्रकार के बीच इसका बहुत प्रभाव और सम्मान था।
नवगठित समिति के पदाधिकारियों को मुख्यमंत्री अपने आवास पर चाय के लिए बुलाते थे। सरकार इन्हें गंभीरता से लेती थी और इनकी हर मांग को तत्काल पूरा करती थी। पत्रकारों की प्रेस मान्यता इत्यादि के फैसलों के लिए सरकार के सूचना विभाग की कमेटी में पत्रकारों के इस संगठन का प्रतिनिधित्व होता था।
लेकिन यूपी के पत्रकारों के गिरते स्तर और आपसी तकरार/बंटवारे/गुटबाजी से समिति का वजूद पहले जैसा नहीं रहा।
पिछली बार आपसी गुटबाजी में दो चुनाव हुए और समिति के दो फाड़ हो गये। जिससे सरकार भी इसे हल्के मे लेने लगी। पत्रकारों में बढ़ती खीचा तानी, खेमेंबाजी, और दो फाड़ तो नयी बीमारी है कोढ़ में खाज ये कि समिति का रजिस्ट्रेशन भी कभी से नहीं रहा है। इन कारणों से सरकार चाह कर भी सूचना विभाग की कमेटी में इसे शामिल नहीं कर सकी।
अभी हाल ही पत्रकारों द्वारा चयनित दोनों ही पत्रकार समितियों को कमेटी में शामिल करने के लिए सूचना विभाग ने आमंत्रित किया, पर अन्य दावेदार छोटे संगठनों ने दोनों के विवाद और रजिस्ट्रेशन ना होने का तर्क देकर इनकी नुमाइंदगी पर आपत्ति दर्ज करके बात खत्म कर दी। जबकि लम्बे समय तक सूचना विभाग की प्रेस मान्यता कमेटी का हिस्सा रही है ये समिति।
पत्रकारों की चुनी हुई इस संवाददाता समिति का एक जमाने में एकक्षत्र राज रहता था। परंपरा रही थी कि चुनाव के बाद नवगठित संवाददाता समिति को मुख्यमंत्री अपने आवास पर आमंत्रित करते थे। पिछले चुनावों के बाद एक ही समिति के दो टुकड़े हो जाने के कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ये परंपरा नहीं निभा सके थे। क्योंकि एक को बुलाते तो दूसरा गुट नाराज हो जाता। एक समिति के दो में से कौन से टुकड़े को स्वीकार करती सरकार?
एक से दो हो चुकीं इन समितियों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है। कोशिश की जा रही है कि एक ही चुनाव हो।
प्रेस मान्यता कार्डों का नवीनीकरण भी लगभग हो ही गया है।कुछ दिनों से खबरे इस बात की भी थी कि छोटे अखबारों के पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यता का नवीनीकरण नहीं होगा। लेकिन ये खबरें गलत साबित हुई।
मौजूदा लगभग नौ सौ प्रेस मान्यताओं में से आठ सौ पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यताओं का नवीनीकरण हो जाने की पूरी उम्मीद है।
लगभग सात सौ पत्रकारों की मान्यता का नवीनीकरण हो जाने की पुष्टि के बाद पत्रकारों के चुनाव ने ज़ोर पकड़ लिया है।
समिति का वर्चस्व रहा नहीं। आपसी एकता स्थापित करने की कोशिशों को अभी कोई सफलता नहीं मिली है। न्यूज प्रिंट पर जानलेवा जीएसटी लागू होने और डीएवीपी की सख्त नीतियों के चलते इस वर्ष (2018) तक के मेहमान हैं आधे से ज्यादा अखबार। 2018 में 60-70% अखबार खत्म हो जाने का खतरा बना हुआ है। ये अखबार डीएवीपी के पैनल से जैसे ही हटेंगे आधे से ज्यादा पत्रकारों की प्रेस मान्यता खुद-ब-खुद निरस्त हो जायेगी।
इन मुश्किलों के बीच भी मान्यता प्राप्त पत्रकारों (वोटर्स) में हर चार पत्रकार में एक पत्रकार चुनाव लड़ने को तैयार बैठा है। यानी कुल आठ सौ पत्रकारों में दो सौ पत्रकार समिति के विभिन्न पदों के लिए चुनावी मैदान में उतरने का मूड बना चुके हैं।
2018 के बाद प्रेस मान्यता कैसे बचेगी? इस फिक्र में डूबे थे कि एक पत्रकार मित्र ने मुझे भी चुनाव लड़ने का मशविरा दिया। मैंने वसीम बरेलवी का एक शेर सुना कर बात खत्म कर दी:
घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है,
पहले ये तय हो कि घर कैसे बचाया जाये।
नवेद शिकोह







