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    क्या काला धन भये कोयला?

    By July 8, 2018 Hot issue No Comments8 Mins Read
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    जी क़े चक्रवर्ती
    अभी तक काले धन पर तरह तरह लेख, संपादकीय देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में समय समय पर छपते रहते हैं और अभी भी छपते चले जा रहे हैं लेकिन अभी तक इसका  जोड़दार प्रभाव पड़ते नही दिखा। शायद ऐसा इसलिए कि विदेशी बैंको में जिन लोगों के धन जमा है स्वाभाविक सी बात है कि ऐसे लोग देश के कोई साधारण लोगो मे गिनती किये जाने वाले व्यक्ति अवश्य नही होंगे।
    जाहिर सी बात है कि जब यह लोग साधारण लोग नही है तो उनकी पहुंच भी ऊँचे स्तर के लोगों के मध्य अवश्य होगी क्या ऐसे में हम देश के शीर्ष पर बैठे हुए उन लोगो से इन काले धन वाले लोगों के साथ शक्ति या निर्दयता से पेश आने या उनको कठोर सजा देने की उम्मीद कैसे कि जा सकती है? देश का धन दूसरे देश मे ले जाने के बाद विदेशो में रह कर उन रुपयों से विलासिता पूर्ण जिंदगी जीना क्या यह कार्य एक सच्चे देश भक्त इंसान का काम नही हो सकता है। ऐसे लोग तो देश के गद्दारों की श्रेणी में भगोड़े लोग ही हो सकते हैं।
    किसी भी देश के चौमुखी विकास के लिए यह यह अत्यंत आवश्यक है कि उस देश की अर्थव्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि वित्तीय साधनों का विनियोजन आर्थिक विकास में सहायक सिद्ध हो। विगत कुछ वर्षों से हमारे देश को अनेको आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं से जूझना पड़ा है, जिसकी प्रमुख वजहों में हमारी अर्थव्यवस्था के समानांतर एक और अर्थव्यवस्था काले धन के रूप में देश मे चल रही थी जिसने धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत कर ली और फिर वही अर्थ व्यवस्था देश की वास्तविक मुख्य अर्थव्यवस्था बन कर रह गयी थी। जोकि हमारी राजनीति का प्राण होने के साथ ही नई पश्चिमी संस्कृति सभ्यताओं की सप्ततारा होटलों की वैभव रखने वाली संस्कृति की उन्नायक के रूप में देश मे स्थापित हो गयी।
    किसी भी देश में उसके यहां चलने वाली अर्थव्यवस्था के ठीक समांतर दूसरी अर्थव्यवस्था काले धन के रूप में चलने के कारण सरकार के आय के स्रोतों के मध्य व्यवधान उतपन्न करता ही है साथ ही साथ देश के सीमित वित्तीय संसाधनों को भी गलत दिशा में मोड़ देती है। इस काले धन रूपी अर्थव्यवस्थाया के समानांतर चलाने वाली देश की मुख्य अर्थव्यवस्था में धन की समस्या सामान्य समस्याओं से विल्कुल हट कर है। हमारे देश की सामान्य आर्थिक समस्याओं में जैसे गरीबी, बेरोजगारी, मुद्रास्फीति आदि हैं। जब हम देश की इन आर्थिक समस्या के विषय मे सोचने लगते हैं तो हमारा ध्यान देश में फैली निर्धनता तथा बेरोजगारी पर ही केंद्रित हो कर रह जाती है। जबकि दूसरी अर्थव्यवस्था के रूप में चलने वाला काले धन से वह व्यक्ति या लोगों के समूहों को बिल्कूल भी प्रभावित नहीं करता है, जो इस काले धन को स्वयं रखते है या स्वमं काले धन के जनक है बल्कि इससे समाज के ऐसे लोग ही इससे प्रभावित होते हैं, जिनको कि इस काले धन से कोई भी लेना देना नही होता है।
    खैर काले धन पर लगाम लगाने के प्रयासों में मौजूदा सरकार की नीतियों से बहुत हद तक इस पर नियंत्रित पाने में सफलता अवश्य पायी है। देश मे फैले ‘काले धन’ का उपयोग सामान्यत: बिना हिसाब-किताब वाले या सरकार से छुपाई हुई आय से उपजा धन जिसका प्रयोग पूर्णतया अथवा अंशतः प्रतिबंधित सौदों में लगाया जाता है। काले आय का अर्थ यह है कि उन सभी तरह से अवैध तौर तरीकों से कमाया गया धन जिन्हें करों की चोरी, गुप्त कोषों तथा अवैध कार्यो के माध्यम से एक वित्तीय वर्ष की समयवधि में अर्जित कर इस धन को हीरे-जवाहरातों, सोना-चाँदी, बहुमूल्य रत्नों, मकान,भूमि या व्यापारिक लेन-देन में खर्च कर सुरक्षित कर दिया जाता है।
    ऐसे काले धन को आयकर वालों या सरकार की नजरों से छुपाने के लिए इस तरह की क्रियों को प्रयोग में लाया जाता है। इसी परिपेक्ष में कुछ लोगों द्वारा विदेशों में सरकार के आंखों में धूल झोंक कर अपने धन को स्विस बैंक या अन्य विदेशी बैंकों में जमा कर दिये जाने से यह धन हमारे देश की मुख्य अर्थव्यवस्था से बाहर निकल जाने से देश मे धन की कमी को उजागर करती है। यदि यही धन हमारे अर्थव्यवस्था से बाहर जाने की वजाय यह अर्थव्यवस्था में लगातार बने रहने पर देश का विकास होने के साथ ही साथ हमारे देश मे धन की कोई कमी भी न रहे, साथ ही देश वासियों को भी धन की कमी का सामना नही करना पड़े और यथा संम्भव देश की विकास भी दूत गति से होने लगे। इस धन को देश मे पुनः वापस लाने के लिए मौजूदा सत्तासीन सरकार द्वारा देश की जनता से वादा किया था।
    जहां तक वर्तमान समय की बात कि जाए तो यह बात निकल कर आ रही है कि विदेशों में जमा सभी धन काला नही है, इस कथन के सच्चाई पर यदि हम गौर करें तो यह प्रश्न उठता है कि क्या सत्ता में मौजूद लोगों के भी गुप्त धन इन विदेशी बैंकों में जमा है? इसी के साथ एक और प्रश्न उठना लाजमी है कि आखिरकार हमारे देश वासियों को विदेशों में अपने धन को रखने कि जरूरत कियूं पड़ी? क्या हमारे देश मे रुपये रखने के लिए बैंके या रुपयों को नियोंजित करने के लिए उधोग धंधे नही है? इस प्रश्न के उत्तर में हम यह कह सकते हैं कि विदेशी बैंकों में व्यवसायी लोगों को धन रखने की आवश्यकता को समझा जा सकता है लेकिन जो लोग देश मे ही रहते हुए ऐसे लोगों को अपने धन को विदेशी बैंकों में रखने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? ऐसी अवस्था मे यह स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे लोगों ने अपना धन विदेश में क्यों रखा है?
    यह विदेश में धन रखने वाले ऐसे लोग हैं जिन लोगों ने सरकारी टैक्स की बचत की या तो अवैधनिक रूप से धन को देश मे एकत्रित किया है जिसके उदहारण स्वरूप अभी अभी ताजे घटना क्रम में विजय माल्या शराब कारोबारी जैसे लोगों ने पहले असंवैधानिक तौर-तरीको से देश मे बैठ कर धन कमा-कमा कर उसे विदेशी बैंकों में जमा करते रहे और फिर देश छोड़ भाग कर विदेश में रह कर विलासितापूर्ण जीवन यापन करने लगे।
    विगत सात पहले वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने काले धन के मामले में एक उच्च स्तरीय विशेष जांच दल का गठन किया है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी पी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में विशेष जांच दल (एसआईटी)का गठन किया गया था। विदेशी बैंकों में जमा काले धन की जांच कर उसे देश मे वापस लाने की कोशिशों पर यह दल निगरानी रखने का काम करेगा।
    लोकसभा चुनाव के दौरान ही मोदी ने स्पष्ट किया था कि सरकार बनने के बाद कालाधन रखने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। इधर, जैसे ही सरकार का गठन हुआ मोदी सरकार ने कालाधन के काले मालिकों पर कार्यवाही शुरू कर दी, जिसका असर अब व्यापक रूप से सम्पूर्ण देश में देखने को मिल रहा है।
    दरअसल, मोदी सरकार ने कालेधन को लेकर देश की जनता को आश्वस्त किया था कि इस पर वह कड़े कदम उठाएगी और साथ ही दोषियों पर भी उचित कार्रवाई करेगी। मोदी सरकार को सत्ता में आए चार वर्षो से अधिक का समय गुजर चुका है, यदि हम सरकार के कालेधन के देश मे वापसी के मामले में कथनी और करनी का मूल्यांकन करें, तो परिणाम कुछ हद तक सकारात्मक ही कहना पड़ता है। इसके मूल में जाकर देखे तो हमे यह कहना पड़ता है कि सरकार ने कालेधन के कारोबारियों पर बड़ी शालीनता से कड़ी कार्रवाई की है।
    बहरहाल, अगर काले धन पर चर्चा की जाए, तो निश्चित रूप से सरकार ने इस पर कुछ बड़े और महत्वपूर्ण कदम अवश्य उठाये हैं। जिसके उदाहरण स्वरूप सरकार ने कालेधन पर सक्रियता दिखाते हुए कैबिनेट की पहली बैठक में ही सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कालेधन के लिए जस्टिस एम.बी.शाह की अध्यक्षता में एसआईटी का गठन किया था। मोदी सरकार कितनी गंभीर है, इस मसले पर इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कोर्ट के बार–बार फटकार के बावजूद उस समय की सत्तासीन यूपीए नीति की सरकार ने कमेटी गठित करने की जहमत नहीं उठाई। लेकिन मोदी के सत्ता संभालते ही सबसे पहले इस मसले पर विचार कर कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हुये इस कमेटी का गठन किया था।
    गौरतलब है कि कालेधन का मुद्दा हमेशा ही ख़बरों की सुर्खियां बनती रही और विपक्ष भी इस पर सरकार की आलोचना करने से नही चूकी। वर्तमान समय मे यह गौर करने लायक बात है कि अभी कुछ ही वर्षों पहले तक हमारे देश का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं था, जहां से भ्रष्टाचार और कालेधन की गंध न आती रही हो, लेकिन अब स्थिति इसके ठीक विपरीत दिखाई देती है।
    हमारे देश के लोगों की यह एक चकित कर देने वाली मनोदशा या स्वभाव है कि उनके सामने से चोरी करके चोर निकल जाने के बाद ही उन्हें होश आता है जैसे कि अभी-अभी उनकी तंद्रा टूटी हो। पहले बहुत दिनों तक शोर शराबा यह मचा कि स्विस बैंक में जमा विदेशी काले धन को पुनः देश मे जल्दी से जल्दी वापस लाया जाये लेकिन जैसे-जैसे समय गुजरात जा रहा है वैसे-वैसे यह उतावले पन में भी ह्रास होता चला जा रहा है। सही अर्थों में कहा जाये तो देश के जिम्मेदार लोगों द्वारा इस दिशा में कितना सार्थक एवं सशक्त प्रयास किये गये है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

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