- परिवार में सास ने दिया पूरा सहयोग
लखनऊ, 27 अगस्त 2018: लखनऊ जिले के काकोरी विकासखंड का एक गाँव है लालपुर। यहां की आशा बहु पुष्पा भारती (आयु है 45) शुरू से ही गाँव और समाज के लिए कुछ करना चाहती थी। शायद इसी गहरी इच्छा के चलते पुष्पा ने आशा बनने का निश्चय 2006 में लिया हालाँकि गाँव में जाति और धर्म की सोच की वजह से उसे ताने भी सुनने पड़े परन्तु पति और परिवार का पूरा सहयोग था जिसकी वजह से वह अपने रस्ते से हिली नहीं।
यूनिसेफ के द्वारा 3 अगस्त 2018 को आशा बहु पुष्पा को दिल्ली बुलाया गया जहाँ उन्हें सम्मानित किया गया तथा उन्हें गृह आधारित शिशु देखभाल पर बोलने को भी कहा गया तथा उसका विडियो भी बनाया गया। जिसका प्रसारण टेलीविज़न पर भविष्य में होना है।
पुष्पा बताती हैं कि जब उन्होने काम करना शुरू किया था तब गाँव में सभी प्रसव घर पर ही होते थे। टीकाकरण से भी महिलाएं कतराती थीं। उनका कहना था कि उनकी सास कहती हैं कि उनके समय में कोई टीका नहीं लगता था।
पुष्पा का कहना है कि जब वे सर्वेक्षण के लिए गृह भ्रमण के लिए निकलती थीं तो लोग उनके सवालों का जवाब नही देते थे और कहते थे कि यह सब बेकार की बातें हैं जिसमें 20-25 परिवार एक विशेष समुदाय के हैं। इन परिवारों के साथ काम करने में बहुत ज्यादा दिक्कत होती थी। इन सब से निपटने के लिए उन्होने गाँव की महिला प्रधान व ए.एन.एम से मदद मांगी व गाँव की महिलाओं के साथ बैठक करनी शरू की।
तब पुष्पा ने चित्रों, किताबों व नाटक के जरिये लोगों को संस्थागत प्रसव, प्रसव पूर्व व प्रसव पश्चात देखभाल, शिशु देखभाल तथा टीकाकरण के बारे में लोगों को बताना शुरू किया। इसमें उनके परिवार विशेषकर उनकी सास ने सहयोग दिया।
पुष्पा ने लोंगों को प्यार से समझाया और संस्थागत प्रसव के लाभ के साथ साथ इसमें दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि के बारे में भी जानकारी दी।
टीकाकरण के प्रति लोगों में जागरूकता के लिए पुष्पा बार-बार उन्हें समझाने के लिए उनके घर जाकर उसके बारे बताती, जिससे लोगों में परिवर्तन आया और अपने बच्चों के टीके लगवाने लगे।
गाँव की किशोरियों के साथ भी बैठक करने लगी। उनको माहवारी स्वच्छता से जुड़ी साफ़-सफाई की जानकारियाँ देने लगी।
उसके प्रयासों से लोगों के नज़रिए में बदलाव आने लगा। प्रारंभ में एक या दो महिलाएं ही सी.एच.सी. पर प्रसव कराने को तैयार हुयीं। लेकिन जब उन्होने देखा की सरकार द्वारा अच्छी सुविधाएं अस्पताल में दी जा रही है और उनका पैसा भी नहीं लग रहा है तब उन्होने गाँव में इसके बारे में अन्य महिलाओं से बात करनी शुरू की।अब तो यह स्थिति है की सभी महिलाएं व बच्चों का टीकाकरण होता है। समय पर पंजीकरण करवाती हैं। 2009 से इस गाँव में घर पर प्रसव नहीं हुआ है।
पुष्पा बताती हैं कि 17 फ़रवरी 2018 को उनके क्षेत्र में एक महिला (संगीता) ने कम वजन को बच्ची को जन्म दिया। बच्ची का जन्म के समय वजन 2kg था। प्रसव सीएचसी पर सामान्य हुआ था। सीएचसी पर नर्स ने के०एम०सी के बारे में बताया। आशा बहु उनके साथ 3 दिन तक सीएचसी पर रुकी। 3 दिन बाद जब वह सीएचसी से डिस्चार्ज होकर घर आयी , उसके बाद आशा पुष्पा ने नियमित रूप से सप्ताह में 2 बार उसके घर विजिट की। उसकी मां को बच्ची को लगातार केएमसी देते रहने को कहा और 6 माह तक केवल स्तनपान कराने को कहा। अब 6 माह का बच्ची हो गयी है उसका वजन 5.5kg हो गया है।
संगीता बताती हैं कि आशा दीदी पुष्पा द्वारा बार-बार हमारे घर आ कर स्वस्थ सम्बन्धी जानकारी देने से आज उनकी बच्ची स्वस्थ है। वह हमारे घर आकर मेरी और बच्ची की स्वास्थ्य की लगातार जाँच करती थी, वह बच्ची के शरीर का तापमान जांचती थी, उसका वजन लेती थी और देखती उसकी सांस सामान्य है। खतरे के कोई भी लक्षण पाए जाने पर हमको डॉक्टर की मदद लेने की सलाह देती थी और साथ ले जाती थी। उन्होंने हमे बच्ची को संक्रमण से बचाने के लिए, गोद में लेने से पहले हाथ धोने की सलाह भी दी। उन्होंने हमे 6 माह तक लगातार स्तनपान कराने को भी कहा और 6 माह बाद स्तनपान के साथ अर्धठोस आहार देने को भी कहा, उनके द्वारा बताये गयी सारी बातों का मैंने अच्छे से पालन किया और उसका नतीजा आज मेरी बच्ची स्वस्थ है।’’







