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    Home»इंडिया

    तुम्ही से मोहब्बत, तुम्ही से लड़ाई 

    By November 21, 2018 इंडिया No Comments5 Mins Read
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    • समाचार प्लस चैनल के उमेश कुमार को लेकर सरकार का डबल स्टेंडर्ड
    • सरकार या तब गलत थी या अब गलत है !
    • कल सरकार को लगता था कि उमेश को समाजविरोधियों से खतरा है। अब लगने लगा कि उमेश खुद समाजविरोधी हैं और समाज को उससे खतरा है
    नवेद शिकोह
    लखनऊ, 21 नवंबर 2018: एक वक्त था जब उत्तराखंड की मौजूदा सरकार को ही लगता था कि समाचार प्लस चैनल के उमेश कुमार अपनी निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के कारण खतरे मे हैं। समाज विरोधी ताकतों से उनकी जान को खतरा है। इस बिना पर सरकार ने समाचार प्लस के सीइओ/पत्रकार  उमेश कुमार को विशेष सुरक्षा से लैस कर दिया था।
    सरकार और उसकी पुलिस का मौजूदा रवैये देखकर तो ये लग रहा है कि चंद दिनों में उमेश फरिश्ते से शैतान हो गये। निर्भीक, निडर, निष्पक्ष, जांबाज और ईमानदार पत्रकार से एकाएक ब्लैकमेलर पत्रकार हो गये, माफिया डाॅन हो गये.. राष्ट्रद्रोही हो गये।
    ताज्जुब करने की बात है कि पल भर में पत्रकारिता का भगवान ब्लैकमेलिंग और राष्ट्रद्रोह का शैतान कैसे हो सकता है !
    कोई जरूरी नहीं कि दौलत और अनुभव ही पत्रकारिता का खाद्य – पानी होता है, कम पैसे और कम अनुभव में भी मेहनत और प्रतिभा के बल पर कोई न्यूज चैनल तरक्की कर सकता है।
    समाचार प्लस के कर्ताधर्ता और उनकी अधिकांश रिपोर्टिंग की टीम बहुत अधिक अनुभवी नहीं थी। इस ग्रुप में बड़े शेयर होल्डर्स का कोई विशेष शेयर/निवेश भी नहीं था। फिर भी पांच-सात वर्षों से ये न्यूज चैनल भारी भरकम खर्चों के साथ दिन दूना तरक्की कर रहा था। सरकारों का भी पूरा सहयोग मिल रहा था। सरकार ने कभी भी इस चैनल की आय-व्यय पर शक भी जाहिर नहीं किया। चैनल के एक स्टिंगर के खिलाफ भी ब्लैकमेलिंग का मुकदमा नहीं लिखा गया।
    फिर एक दम से चैनल के मालिक/पत्रकार उमेश कुमार के चरित्र में इतने ऐबों के इतने ज्यादा वायरस कैसे घुस गये कि सरकार इनके पीछे हाथ धोकर पड़ गई। पुलिस इन्हें शातिर अपराधी मानने लगी। किसी माफिया सरगना/शातिर अपराधी को जेल भेजने से पहले पुलिस उसे रिमांड पर ले लेती है। ऐसे ही उमेश के साथ हुआ। ये जब जेल जाते हैं और कुछ दिन बाद कानून की मदद से इन्हें जमानत मिलती है तो दूसरे राज्य की पुलिस दूसरे गंभीर आरोपों में इन्हें घसीट कर ले जाती है। राष्ट्र विरोधी धाराओं के आरोपों की चपेट में सख्त सलाखों के पीछे बंद ये पत्रकार मृत्यु शैय्या (जैसा कि जारी तस्वीरों में दिख रहा है) पर आ जाता है।
    ये वही पत्रकार हैं जिन्हें इसी सरकार ने विशेष सुरक्षा दी थी। यानी सरकार को डर था कि उनके प्रदेश/देश का ये ईमानदार पत्रकार अपनी निर्भीक /निष्पक्ष पत्रकारिता से समाजविरोधियों को बेनकाब करता है। इसलिए समाजविरोध ताकतें से उमेश कुमार की जान को खतरा हो सकता है। लेकिन अब सरकार/पुलिस को लगने लगा कि ये पत्रकार खुद ही सबसे बड़ा समाज विरोधी है। समाज को इस पत्रकार से खतरा है।
    सरकार किसी को विशेष सुरक्षा ऐसे ही नहीं देती। जांच-पड़ताल की लम्बी प्रक्रिया होती है। जांच एजेंसियां जांच करके ये दरयाफ्त करती हैं कि जान का खतरा बता कर सुरक्षा मांगने वाला शख्स आपराधिक प्रवृत्ति का तो नहीं!  इसका क्रिमिनल बैकग्राउंड तो नहीं! इसपर कोई आपराधिक मुकदमा तो नहीं !
    यदि उमेश कुमार ने निर्भीक, निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता के होते जान के खतरे की आशंका जताई होगी तो उनकी खबरों की ईमानदारी को भी जरूर परखा होगा। तब कहीं जाकर सरकार ने उन्हें विशेष सुरक्षा मुहैय्या की होगी।
    आईये जानते है किसको, क्यों और कैसे मिलती है विशेष सुरक्षा:
    जान पर खेलकर समाज को विशिष्ट सेवाएं देने वालों  की हिफाजत के लिए सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वो ऐसे व्यक्ति को अतिरिक्त/विशेष सुरक्षा दें। सुरक्षा हासिल करने के लिए सुरक्षा की मांग करने वाले को संभावित खतरा बता कर सरकार के समक्ष आवेदन करना होता है। राज्य सरकार उस व्यक्ति के बताए खतरे का पता लगाने के लिए खुफिया एजेंसियों को केस सौंपती है और रिपोर्ट मांगती है।
    उस व्यक्ति का आचरण, व्यवहार और बैकग्राउंड देखा जाता है। जब रिपोर्ट बताती है कि हां वाकई इसे जान का खतरा है तब राज्य में गृह सचिव, महानिदेशक और मुख्य सचिव की एक समिति यह तय करती है कि उस व्यक्ति को किस प्रकार श्रेणी की सुरक्षा दी जाए, या ना दी जाये। रजामंदी के बाद औपचारिक मंजूरी के लिए इस व्यक्ति की फाइल केंद्रीय गृह मंत्रलय को सोंपी जाती है। गृह सचिव की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति तय करती है कि इस शख्स को कितना खतरा है और उसे किस वर्ग की सुरक्षा दी जानी चाहिए है। इतनी जद्दोजहद और जांच पड़ताल के बाद सरकार जनता के टैक्स के पैसों की मंहगी सुरक्षा समाज के विशिष्ट और जांबाज व्यक्ति को मोहय्या करती है।
    विशेष प्रकार की सरकारी सुरक्षा के फैसले में स्थानीय पुलिस से लेकर प्रदेश सरकार और केंद सरकार का गृहमंत्रालय तक की सहमति होती है।
    कल तक इसी तरह की सुरक्षा के घेरे से घिरे रहते थे पत्रकार उमेश कुमार। आज भी पुलिस के घेरे से घिरे हैं, लेकिन दोनों में बहुत फर्क है। सरकार के मिजाज और बदलते रूख की तरह।

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