सत्ता की राजनीति बेहद निर्मम होती है अगर शुरू से ध्यान न दिया जाए तो यह सभी दावं का सारा खेल बिगाड़ सकते हैं। इस तथ्य के बावजूद कि पकड़ अपनी ही दिखाई देती है। ठीक एक जंग की तरह खेल हो या जंग एक पक्ष का हारना और दूसरे का जितना अवश्यंभावी है।
राजनीति इसलिए विलक्षण है कि किसी भी बिंदु पर आश्रित होना आगे के रास्ते में खुद ही कांटे बोने के समान है। इसलिए जरूरी यह भी होता है कि जीत या हार के बाद भविष्य के लिए अपने कार्यों का निर्धारण भी सोच समझ कर किया जाए। जीत की खुशी या हार का गम कुछ समय के लिए हावी होना चाहिए।
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों से उभरने वाला संदेश यही है कि लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति कितनी भी ऊंची हैसियत में क्यों ना पहुंच जाए और उसके भाग्य निर्धारण का अधिकार और शक्ति केवल मतदाता के पास ही है।
विडंबना भी है कि इतनी बड़ी शक्ति के बावजूद कष्ट उसी को उठाना पड़ता है। किंतु हाल के वर्षों में खिलाड़ियों को दांव देने में वह भी इतना माहिर हो चुका है। जिसके बारे में न तो सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है और ना नतीजे आने के बाद यह बात और भी वजन के साथ साबित हो रही है। पराजित पक्ष नतीजों के पहले खुद को कितना भी आत्मविश्वास से लबरेज क्यों ना दिखाता रहा हो लेकिन अब उसको भी यह सोचना पड़ रहा है कि आखिर गलती कहां हो गई खुद उसके समर्थक खुले तौर पर या दबी जुबान पर इन गलतियों की चर्चा करने लगे हैं ये गलतियां वास्तव में राह से भटकने का परिणाम है।
बता दें कि सत्ता जब भी जनता से विमुख होती है तो ऐसी ही स्थिति सामने आती हैं। यह ऐसा बिंदु है जिसे जीतने वाले पक्ष को सबक के रूप में लेना चाहिए और इसी कारण होती है कि जनता की अपेक्षाएं पूरी नहीं होती। इसलिए सकारात्मक परिणाम देने का जिम्मा दूसरे पक्ष को जीताकर दिया जाता है। अब यदि विजय को स्थाई मानकर केवल स्वार्थ को सर्वोपरि रखा जाए तो पुनर्मूषकों भव: की स्थिति आने में देर नहीं लगती।
पांच राज्यों के चुनाव परिणाम तो फिलहाल यही चेतावनी देते हैं कि लोग परफॉर्मेंस परिणाम चाहते हैं। इस हद तक की वायदों व भावनाओं से प्रभावित होना भी अब उनके स्वभाव में नहीं रह गया है जो बात महत्त्व रखती हैं वह यह कि बात जब उनके कल्याण की हो तो वह किस सीमा तक अमल में परिणाम के रूप में सामने आती है उसका निराश होना ही खेल को बिगाड़ देता है। मजे की बात यह है कि मतदाता अब अंतिम क्षणों तक अपनी निराशा को भी जाहिर नहीं करता बल्कि पूरी निर्ममता के साथ अपना फैसला देता है। हाल के चुनावों में इसी आशा और निराशा का जो संघर्ष चला है 2019 में उसके चरम के लिए सबको तैयार रहना होगा।







