डॉ दिलीप अग्निहोत्री
राहुल गांधी की बहत्तर हजार करोड़ रुपये योजना से इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के बयान ताजा हुए है। करीब आधी शताब्दी पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था। अब इतने समय बाद इसी पीढ़ी के राहुल गांधी ने अपरोक्ष रूप से स्वीकार किया कि देश से गरीबी नहीं हटी है।इसके बाद प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी ने देश की व्यवस्था का उल्लेख किया था। उनका कहना था कि केंद्र से सौ पैसे भेजे जाते है, इसमें केवल पन्द्रह पैसे ही जमीन तक पहुंचते है। यूपीए सरकार इसी व्यवस्था से चल रही थी। यही कारण था कि उसकी मनरेगा भी भ्र्ष्टाचार में घिर गई थी। इसी प्रकार किसान कर्ज माफी पर भी आरोप लगे थे।उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड को जो पैकेज दिया गया था, उसका भी हश्र राजीव गांधी के बयान के अनुरूप हुआ था।
अब राहुल गांधी ने गरीबों को बहत्तर हजार रुपये देने की बात कही, उसे भी कांग्रेस की परंपरा के आधार पर देखना होगा। ऐसी ही ऐसी व्यवस्था के चलते कांग्रेस की सरकारें गरीबी हटाने में नाकाम रही। इन्होंने जो योजनाएं बनाई, गरीबों तक उनका लाभ राजीव गांधी के हिसाब से मिलता था। सब्सिडी में भी बहुत घपला होता था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस व्यवस्था को बदला। जनधन खाते के माध्यम से उन्होंने व्यवस्था को बदलने की शुरुआत की थी। गरीबों तक योजनाओं का लाभ पहुंचने लगा।

राहुल गांधी सरकार पर कुछ पूंजीपतियों के कर्ज माफी का आरोप कई वर्षों से लगा रहे है, जबकि वित्तमंत्री अरुण जेटली के दावा है कि इस सरकार ने उद्योगपतियों का एक रुपया भी माफ नहीं किया है। इसके विपरीत यूपीए सरकार ने मनमाने ढंग से जो कर्ज वितरित किये थे, वह वर्तमान सरकार के लिए बोझ बन गए है। यूपीए में कुछ उद्योगपतियों को ये कर्ज फोन के माध्यम से ही दिए जा रहे थे। इस प्रकार जेटली पहले ही राहुल के आरोप की हवा निकाल चुके थे, लेकिन राहुल अपनी फितरत के अनुसार एक ही आरोप को वर्षों तक रटते रहते है।
वैसे यूपीए और भाजपा सरकार के बीच फर्क को साफतौर पर देखा जा सकता है। यूपीए के समय आर्थिक व्यवस्था में बहुत छेद थे, बिचौलिए और दलाल मौजूद रहते थे। प्रधानमंत्री ने इन पर रोक लगाई, तीस करोड़ से अधिक लोगों के बैंक खाते खुलवा दिए। इससे लाखों करोड़ रुपये की बचत हुई, उसके बाद गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाई, और उन्हें लागू किया। अभी करोड़ो किसानों के खाते में दो हजार रुपये भेजे गए। भविष्य में भी यह योजना जारी रहेगी। मतलब साफ है नरेन्द्र मोदी ने गरीबों के हिस्से का धन उन तक पहुंचाया। यूपीए सरकार में ऐसी इच्छाशक्ति नहीं थी। प्रत्येक स्तर पर घोटालों का इंतजाम था।
इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा उन्नीस सौ इकहत्तर में दिया था। तब देश की जनसंख्या करीब चौवन करोड़ थी। इनमें इकतीस करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे थे। इस समय सवा सौ करोड़ लोगों में पैंतीस कतोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे है।
मनमोहन सिंह सरकार ने बत्तीस रुपये कामाने वाले को गरीब नहीं माना था। इसके अलावा मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। मतलब साफ है कि कांग्रेस गरीबों के प्रति कभी गंभीर नहीं रही है।कांग्रेस इस फार्मूले के तहत बड़ी संख्या में गरीबों को योजनाओं के लाभ से बाहर कर दिया गया था। अब राहुल गांधी ने घोषणा की है कि अत्यंत गरीब बीस प्रतिशत गरीब परिवारों को बहत्तर हजार रुपया प्रतिवर्ष देंगे।
प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद का आकलन है कि राहुल गांधी की यह घोषणा देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देगी। आर्थिक वृद्धि,मुद्रा स्फीति और राज कोषीय अनुशासन में सही संतुलन स्थापित करने के लिए पिछले पांच वर्षों में अनेक कारगर कदम उठाए गए है। राहुल गांधी की चुनावी घोषणा इस संतुलन को चौपट कर देगी, और लोक कल्याणकारी कार्यो में कटौती करनी होगी। ये दोनों तथ्य देश को बदहाली की तरफ ले जायेगे।
न्याय योजना की कुल लागत करीब साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये होगी। यह देश की जीडीपी का एक प्वाइंट नौ प्रतिशत और केंद्र सरकार के खर्च का चौदह प्रतिशत है। राहुल ने यह नहीं बताया कि योजना के लिए धन कहाँ से आएगा। यह कहने से काम नहीं चलेगा कि नरेन्द्र मोदी उद्योगपतियों की जेब में पैसा डालते है, हम गरीबो को देंगे। इतनी बड़ी योजना का जबाब मसखरेपन से नहीं देना चाहिए। उद्योगपतियों की जेब में पैसा डालने में कांग्रेस भी कभी पीछे नहीं रही। आकलन है कि कांग्रेस को योजना लागू हुई तो देश की अर्थव्यवस्था को पटरी से उतर जाएगी। राजकोषीय संतुलन चौपट हो जाएगा, महंगाई भी बेकाबू हो जाएगी। इससे राजकोषीय घाटा बढ़कर साढ़े दस लाख करोड़ रुपये से भी अधिक हो जाएगा । राजकोषीय घाटे का संतुलन बिगड़ने से महंगाई भी बेकाबू हो जाएगी।
महंगाई बढ़ने पर रिजर्व बैंक को ब्याजदरों में वृद्धि करनी पड़ेगी। इसका प्रतिकूल प्रभाव विकास दर पर पड़ेगा। बजट का आकार बढ़कर करीब साढ़े इकतीस लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा। इसके साथ ही जो सबसे बड़ा नुकसान होगा वह यह कि, राजकोषीय घाटा सात लाख करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग साढ़े दस लाख करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगा। नरेन्द्र मोदी सरकार ने बारह करोड़ से अधिक किसान परिवारों को छह हजार रुपये देने की योजना लागू की है। इसकी पहली किस्त भेजी जा चुकी है। इसके लिए चालू वित्त वर्ष में बीस हजार करोड़ रुपये व आगामी वित्तीय वर्ष के लिए पचहत्तर हजार करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है। नरेन्द्र मोदी को इस योजना से अर्थव्यवस्था को कोई नुकसान नहीं होगा। इसके अलावा कांग्रेस के न्याय के मुकाबले दो गुने ज्यादा गरीब परिवार इससे लाभान्वित होंगे।
केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कांग्रेस की योजना को धोखा करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह धनराशि नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा मौजूदा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण द्वारा मुहैया कराई जा रही राशि के दो-तिहाई से कम है। सब्सिडी के रूप में करीब साढ़े पांच लाख करोड़ रुपये गरीबों को पहले ही वितरित किए जा रहे हैं। पचास वर्षों से कांग्रेस देश को गुमराह कर रही है। गरीबी हटाओ का नारा देने के बाद भी बीस प्रतिशत लोगों की आय बारह हजार रुपये भी नहीं है, तो देश के गरीबों को नजरअंदाज करने की जवाबदेही आपकी बनती है। जाहिर है कि कांग्रेस पुनः देश की अर्थव्यवस्था को अपने पुराने दौर में पहुंचाना चाहती है। जिसमें राजीव गांधी का कथन चरितार्थ होता रहे। इसके अलावा कांग्रेस ने मान लिया है कि उसे अब केंद्र की सत्ता में नहीं पहुंचना है। ऐसे में बड़े बड़े वादे करने में क्या हर्ज है।
कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान में भी वह कर्जमाफी का वादा उचित ढंग से लागू करने में विफल है। राहुल गांधी ने कहा कि जिन परिवार की आय बारह हजार रुपये से कम है, उन्हें इस योजना का लाभ मिलेगा। आगे चलकर पच्चीस करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला जाएगा। गरीबी दूर करने के लिए कांग्रेस मनरेगा लाई थी, अब हम न्यूनतम आमदनी की गारंटी देने जा रहे हैं। मनरेगा के जरिए देश की चौदह करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला। हम देश से गरीबी खत्म करना चाहते हैं।
यूपीए शासन की मनरेगा कारगर नहीं थी। वैसे भी यह वर्ष में सौ दिन के रोजगार की योजना थी। इसमें जम कर फर्जीवाड़ा होता था। ऐसे में चौदह करोड़ लोगों को गरीबी योजना से बाहर निकालने की बात गलत थी। इसी आधार पर राहुल की नई योजना का आकलन हो सकता है। उन्नीस सौ इकहत्तर में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ के नारे पर चुनाव जीता था, लेकिन उन्होंने गरीबी हटाने के लिए जरूरी काम नहीं किए। उनके कार्यकाल में गरीबी ही बांटी गई थी।
यूपीए के समय सात हजार करोड़ रुपये का कर्ज माफ करने का दावा किया था, जबकि मात्र बावन करोड़ कर्ज ही माफ किया गया और कैग रिपोर्ट के मुताबिक उसका ज्यादातर हिस्सा दिल्ली के व्यापारियों को दिया गया। जबकि इस समय किसान सम्मान योजना के तहत प्रतिवर्ष पचहत्तर हजार करोड़ रुपये दिए जा रहे हैं।
जाहिर है कि राहुल गांधी अपनी चुनावी योजना के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारना चाहते है। वह कांग्रेस शासन के समय की व्यवस्था लाना चाहते थे। जिसकी योजनाओं में बड़ी धांधली होती थी। सौ पैसे की योजना का केवल पन्द्रह पैसा गरीबों के पास पहुंचता था। इसलिए कांग्रेस की इस चुनावी चाल पर विश्वास करना मुश्किल है।








1 Comment
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