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    Home»साहित्य

    हिंदू-मुस्लिम एकता पर प्रेमचंद की राय आज ज्यादा प्रासंगिक है

    By July 31, 2017Updated:July 31, 2017 साहित्य No Comments4 Mins Read
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    31 जुलाई, प्रेमचंद, जन्मदिन विशेष

    यह बात हमारे अंदर ठूँस दी गयी है कि हिंदू और मुसलमान हमेशा से दो विरोधी दलों में विभाजित रहे हैं, हालाँकि ऐसा कहना सत्य का गला घोंटना है।

    यह बिल्कुल ग़लत है कि इस्लाम तलवार के बल पर फैला। तलवार के बल से कोई धर्म नहीं फैलता, और कुछ दिनों के लिए फैल भी जाय, तो चिरंजीवी नहीं हो सकता। भारत में इस्लाम के फैलने का कारण , ऊँची जाति वाले हिंदुओं का नीची जातियों पर अत्याचार था।

    नीचों ने इस नये धर्म का बड़े हर्ष के साथ स्वागत किया और गाँव के गाँव मुसलमान हो गये। जहाँ वर्गीय हिंदुओं का अत्याचार जितना ही ज़्यादा था, वहाँ यह विरोधाग्नि भी उतनी ही प्रचण्ड थी और वहीं इस्लाम की तबलीग भी ख़ूब हुई। कश्मीर, आसाम, पूर्वी बंगाल आदि इसके उदाहरण हैं। आज भी नीची जातियों में ग़ाज़ी मियाँ और ताज़ियों की पूजा बड़ी श्रद्धा के साथ की जाती है। उनकी दृष्टि में इस्लाम विजयी शत्रु नहीं उद्धारक था। यह है इस्लाम के फैलने का इतिहास, और आज भी वर्गीय हिंदू अपने पुराने संस्कारों को नहीं बदल सके हैं।

    अब रही संस्कृति-

    हमें तो हिंदू और मुस्लिम संस्कृति में कोई ऐसा मौलिक भेद नहीं नज़र आता। अगर मुसलमान पजामा पहनता है तो पंजाब और सीमा प्रांत के सारे हिंदू स्त्री-पुरुष पाजामा पहनते हैं। अचकन में भी मुसलमानी नहीं रही।

    तो क्या वह गऊ हत्या में है? या शिखा में?या जनेऊ में? जनेऊ तो आज कम से कम अस्सी फ़ीसदी हिंदू नहीं पहनते, और शिखा भी अब उतनी व्यापक वस्तु नहीं है। हम किसी हिंदू को इसलिए अहिंदू नहीं कह सकते कि वह शिखाधारी नहीं है। बंगाल में शिखा का प्रचार नहीं।

    रही गऊ हत्या। यह तो मालूम ही है कि अरब में गाएँ नहीं होतीं। वहाँ तो ऊँट और घोड़े ही पाये जाते हैं। भारत खेती का देश है और यहाँ गाय को जितना महत्व दिया जाय उतना थोड़ा है। लेकिन आज क़ौल-क़सम लिया जाय तो शायद ऐसे बहुत कम राजे-महाराजे या विदेश में शिक्षा प्राप्त करने वाले हिंदू निकलेंगे जो गोमांस न खा चुके हों। और उनमें से कितने ही आज हमारे नेता हैं और हम उनके नामों पर जयघोष करते हैं।
    अछूत जातियाँ भी गौमांस खाती हैं, और आज हम उनके उत्थान के लिए प्रयत्न कर रहे हैं।

    हमें अख़्तियार है , हम गऊ की पूजा करें। लेकिन हमें यह अख़्तियार नहीं है कि हम दूसरों को गऊ पूजा के लिए बाध्य कर सकें। हम ज़्यादा
    से ज़्यादा यही कर सकते हैं कि गौमांस भक्षियों की न्याय बुद्धि को स्पर्श करें। फिर मुसलमानों में अधिकतर गौमांस वही लोग खाते हैं जो ग़रीब हैं; और गरीब अधिकतर वही लोग हैं , जो किसी ज़माने में हिंदुओं से तंग आकर मुसलमान हो गये थे। वे हिंदू समाज से जले हुए थे और उसे जलाना और चिढ़ाना चाहते थे। वही प्रवृत्ति उनमें अब तक चली आती है।

    जो मुसलमान हिंदुओं के पड़ोस में देहातों में रहते हैं, वे प्राय: गौमांस से उतनी ही घृणा करते हैं जितने साधारण हिंदू। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि मुसलमान भी गौभक्त हों, तो उसका उपाय यही है कि हमारे और उनके बीच घनिष्ठता हो, परस्पर ऐक्य हो। तभी वे हमारे धार्मिक मनोभावों का आदर करेंगे।

    सारांश यह कि हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य का कोई यथार्थ कारण नहीं नज़र आता। फिर भी वैमनस्य है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता।यहाँ तक कि हममें से बहुत कम ऐसे महानुभाव हैं , जो इस वैमनस्य के ऊपर उठ सकें। खेद तो यह है, कि हमारे राष्ट्रीय नेता भी इस प्रवृत्ति से ख़ाली नहीं हैं। और यही कारण है कि हम एकता-एकता चिल्लाने पर भी उस एकता से उतने ही दूर हैं। ज़रूरत यह है कि जैसा हम पहले कह चुके हैं कि हम ग़लत इतिहास को दिल से निकाल डालें और देश-काल को भलीभाँति विचार करके अपनी धारणाएँ स्थिर करें।

    (कालजयी हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के हंस , 1931 के अंक में प्रकाशित महत्वपूर्ण लेख के हिस्से। 86 साल बाद आज की राजनीतिक सामाजिक परिस्थितियों में इन विचारों की प्रासंगिकता बढ़ गयी है। 31 जुलाई प्रेमचंद का जन्मदिन होता है।) अमिताभ श्रीवास्तव की वॉल से 

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