आवाम की बात भारत में
जम्मू-कश्मीर के दो टुकड़े करने से पहले केंद्र सरकार अगर वहां के लोगों को इस मुद्दे पर भरोसे में लेती तो बेहतर होता। थोड़ा समय लगता, कुछ उथल-पुथल भी होती शायद लेकिन तब एक बड़ा उलटफेर लोकतांत्रिक, समावेशी और पारदर्शी तरीके से संभव हो पाता। इससे सरकार की साख, सम्मान , रुतबा और इक़बाल सबमें बढ़ोतरी ही होती। अफसोस ऐसा नहीं किया गया। यानि जिस जनता की बेहतरी के लिए इतना बड़ा क़दम उठाने का दावा किया गया, उस पर सरकार और उसके रणनीतिकारों को भरोसा नहीं था शायद।
संसद सत्र जारी रहने के बीच इतना बड़ा फैसला लेने से पहले सरकार ने कोई सर्वदलीय बैठक की हो, सभी दलों के नेताओं से इस बेहद महत्त्वपूर्ण मसले पर राय मांगी हो, ऐसी किसी प्रक्रिया की भी कोई जानकारी नहीं है। कश्मीर में कर्फ्यू जैसे हालात बनाकर, फौजों का जमावड़ा करके, वहां की पार्टियों के नेताओं को नज़रबंद और गिरफ्तार करके वहां किस तरह के भावी खुशहाल लोकतंत्र और सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की नींव रखी जा रही है, इसका अनुमान फिलहाल लगाना बहुत कठिन है। सिर्फ यह आशा ही की जा सकती है कि वहां हालात न बिगड़ें, तनाव न बढ़े और अलगाववाद की आग में किसी को इस बहाने घी डालने का मौक़ा न मिले।
कश्मीर के लिए बहुत नाज़ुक वक़्त है।
केंद्र सरकार ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना भले ही साकार कर लिया हो, आम कश्मीरी का भरोसा जीतने का कड़ा इम्तिहान अभी बाक़ी है। और विपक्ष की तो ख़ैर क्या कहें। जिन दलों ने सरकार के इस फैसले कि समर्थन किया है, उनमें सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला नाम आम आदमी पार्टी का है जिसके मुखिया अरविंद केजरीवाल केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली को तो पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए केंद्र सरकार से मोर्चा लिए हुए हैं लेकिन अच्छे भले पूर्ण राज्य जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के फैसले में उसी केंद्र सरकार के साथ खड़े हैं।
मुक्तिबोध के शब्दों में- पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?
– अमिताभ श्रीवास्तव की वॉल
आये दिन हमारे समाज मे लड़कियों के साथ घिनोने अपराध हो रहे है ।समाज में नैतिकता का हनन हो रहा है। कल जम्मू कश्मीर से धारा 370 और 35a खत्म करने की खबरेँ आने लगी। चूंकि हमारी फ़्रेंड्स लिस्ट में पत्रकार अधिक है सभी खुशी जाहिर कर रहे है । हम सब खुश है कि देश मे एक कानून चलेगा। फिर कुछ मित्रों ने प्रॉपर्टी की खरीद फरोख्त की बातें शुरू की वहाँ तक भी ठीक पर हद तो तब हुई जब हमारे साथ के सभ्य समाज के लोग कश्मीर ससुराल की बातें करने लगे।
एक शादीशुदा व्यक्ति ने पोस्ट डाली तो उस पर कितने कुंवारे व शादीशुदा मजे और चटकारे लेने लगे। धारा 370 और 35 a हटते ही क्या कश्मीरी लड़कियां इनकी बपौती हो गई। समाज मे लड़कियों के साथ ऐसे इतना शोषण हो रहा है ऐसे में हमें जिन लड़कियों की रक्षा का दम्भ भरना चाहिए उन्हें सोशल मीडिया पर बेइज्जत किया जा रहा है। कल के अगर कोई कश्मीरी पुरुष आकर यही बात कहे तो वो देश द्रोही हो जाएगा। जहाँ किसी महिला को भूखी नज़रों से देखा जाता हो ऐसे आज़ादी से तो गुलामी भली!
-मंजू श्रीवास्तव की वॉल







