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    महात्मा गांधी के चिंतन में पर्यावरण

    By September 18, 2019 Current Issues No Comments3 Mins Read
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    लखनऊ,18 सितम्बर 2019: महात्मा गांधी की एक सौ पचासवीं जयंती की प्रेरणा अभी से दिखाई देने लगी है। पर्यावरण,शिक्षा और स्वच्छता पर महात्मा गांधी के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक है। उन्होंने इन तथ्यों को जीवन में उतारने की प्रेरणा दी थी। गांधी जी स्वयं इस पर अमल करते थे। लखनऊ के इण्डिया लिटरेसी बोर्ड, साक्षरता निकेतन में आज गाँधीवादी एवं पर्यावरण विचारक पदम् विभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट ने वर्तमान परिवेश में गाँधी जी की प्रासंगिकता विषयक व्याख्यान-माला का उद्घाटन किया।
    उन्होंने कहा कि गाँधी जी की प्रेरणा से ज्ञान की ज्योति को विस्तारित करने के लिए श्रीमती फिशर ने साक्षरता निकेतन की स्थापना की थी। वास्तव में शिक्षा के क्षेत्र में यह एक अभिनव प्रयोग एवं चुनौती भरा कार्य था। गाँधी जी ने चरखा के माध्यम से सामाजिक विषमता को दूर करने का प्रयास किया। गाँधी जी का मानना था कि विकेन्द्रित व्यवस्था से गाँव का विकास हो सकता है।  गाँधी जी कथनी और करनी के योग के कारण महात्मा बनें। गाँधी ने कहा था कि मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता के लिए धरती सक्षम है। प्रत्येक व्यक्ति के विकास के लिए ग्राम विकास का मंत्र दिया। अपनी आवश्यकता को सीमित करके पृ्थ्वी को सबके जीने लायक बनाएँ। महात्मा गाँधी ने सत्य, अहिंसा सतत कर्मशीलता की वकालत करते हुए प्रकृति का दुरुपयोग रोकने की बात कही। शिक्षा के साथ परिवेश और पर्यावरण की समझ होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के सामने जलवायु परिवर्तन का संकट है, जिसके लिए अभी से सतर्क होने की आवश्यकता है।
    श्री भट्ट ने एक स्लाइड शो के माध्यम से हिमालय की संवेदनशीलता और पर्यावरण एवं विकास के कुछ मौलिक बिन्दु पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हिमालय का पूरे देश के साथ अन्तर्सम्बन्ध है, जिसे समझने की जरूरत है। ग्लोबल वार्मिंग का हिमालय पर सीधा असर पड़ रहा है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। समय पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में पानी की समस्या होगी। वैज्ञानिक इस बात को समझें और समाज में जागरूकता पैदा करें। वनीकरण के माध्यम से बंजर भूमि को हरा भरा बनाया जा सकता है। अंधाधुंध पेड़ों की कटान से बाढ़ का खतरा बढ़ता है, जिससे प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में जान-माल का नुकसान होता है। उन्होंने कहा कि इलाज से बेहतर परहेज है। पेड़ों की कटान से पर्वतों की मिट्टी पानी के साथ बहती है। सिल्ट के कारण रिवर बेड में बदलाव आता है, जिसके फलस्वरूप बाढ़ की विषम स्थिति पैदा होती है। जंगल नष्ट होंगे तो उसका सीधा असर गृृहस्थी पर पड़ेगा।
    गाँधी जी ने इस बात को दशकों पहले अनुभव किया था। पर्यावरण की सुरक्षा हिमालय से शुरू होनी चाहिए। हिमालय पर आने वाले परिवर्तन से पहाड़ी क्षेत्र के साथ-साथ मैदानी क्षेत्र भी प्रभावित होते हैं। नेपाल, भूटान सहित हिमालय से लगे अन्य पड़ोसी देश पर भी इसके विपरीत प्रभाव पड़ते हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है। इण्डिया लिटरेसी बोर्ड के अध्यक्ष जी पटनायक ने महात्मा गाँधी एवं डाॅ वेल्दी एच फिशर के व्यक्तित्त्व एवं कृृतित्त्व पर विस्तार से अपने विचार रखे। यहां जन शिक्षण संस्थान, लखनऊ, कानपुर एवं देहरादून के लाभार्थियों द्वारा निर्मित उत्पादों की प्रदर्शनी भी लगाई गई।
     – दिलीप अग्निहोत्री

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