व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी
बेहद बारीकी से देखने और समझने के बाद भी बजट में मजनूओं के लिए मुझे कुछ भी नजर नहीं आया। न उनके लिए कोई योजना नजर आई न भविष्य का कोई रोड-मैप। कहें तो मजनूओं की झोली खाली की खाली ही रही। वित्तमंत्री का मजनूओं के प्रति ‘उपेक्षा’ का यह भाव मुझे भीतर तक खल गया। इतने गए-बीते तो न है हमारे देश के मजनूं।
सदियों से हमने अपने दिमाग में यह मिथक बना रखा है कि देश की अर्थव्यवस्था को बड़े-बड़े उद्योगपति या पूंजीपति ही मिलकर चला रहे हैं। जबकि देश की आर्थिक रीढ़ को मजबूती देने में मजनूओं की भी महत्ती भूमिका है। वे भी गाहे-बगाहे अपनी जेब का, भले छोटा हिस्सा ही सही, देश को देते हैं। मैं ऐसे बहुतेरे मजनूओं को निजी तौर पर जानता हूं, जो बाकायदा टैक्स देते हैं। इस मुद्दे पर चिंतनरत रहते हैं कि देश का आर्थिक विकास कैसे हो! कैसे वे देश की अर्थव्यवस्था को चीन, जापान और अमरीका से आगे ले जाएं।
हर साल आने वाला वेलेंटाइन डे मजनूओं के लिए ही नहीं बल्कि देश की आर्थिक समृद्धि को भी मजबूत करता है। इस दिन मजनूओं का अपनी प्रेमिकाओं पर किया जाने वाला गिफ्ट्स रूपी निवेश अंततः अर्थव्यवस्था में ही आकर जुड़ता है। मत भूलिए, अपनी हैसियत से कहीं आगे बढ़कर मजनूं इस दिन खर्चा करते हैं। जेब गवाही न दे फिर भी दोस्तों या घर वालों से उधार मांग गिफ्ट्स खरीदते हैं। प्रेमिका खुश रहे और अर्थव्यवस्था सुदृढ़ रहे इसका पूरा ख्याल वे रखते हैं।
ज्यादा कुछ नहीं तो वित्तमंत्री को गिफ्ट्स के लेन-देन में ही कुछ राहत देनी चाहिए थी। पता चला है कि बजट में मोबाइल फोन भी महंगे हो गए हैं। डेटा तो पहले ही महंगा हो गया था। यह सरासर नाइंसाफी है। जब वित्तमंत्री साहिबा ने किसानों के लिए इतनी दरियादिली दिखाई तो मजनूओं ने भला उनका क्या बिगाड़ा था!
प्रेमिका की एक ‘हां’ की खातिर मजनूं क्या-क्या नहीं करता, क्या-क्या नहीं सहता। बहुत से तो अपनी पढ़ाई, अपने करियर तक को दांव पर लगा देते हैं। चूंकि मैं भुक्तभोगी रहा हूं इसलिए मुझे पता है। ऐन वेलेंटाइन डे के आसपास बजट का आना और मजनूओं के लिए कुछ भी न होना, वाकई बहुत कष्ट दे रहा है।
मेरे मोहल्ले की गिफ्ट शॉप में जहां हर वक़्त मजनूओं की भीड़ जमा रहा करती थी, आज कंप्लीट सन्नाटा है। इश्कबाजी और फ़्लर्ट की दास्तानें थम-सी गई हैं। पप्पू भाई (दुकानदार) का चेहरा उदास है। सात दिनों तक चलने वाले वेलेंटाइन पर्व के लिए मंगाया गया सामान धूल खा रहा है।
मैं यह सब अपनी आंखों से देख रहा हूं पर देखा नहीं जा रहा। कितने ही बजट आए और गए पर मजनूओं की इतनी दुर्गत पहले कभी न हुई। देश की अर्थव्यवस्था में अपना सहयोग देने वाला मजनूं वर्ग आज डबडबाई आंखों से वित्तमंत्री साहिबा की ओर निहार रहा है कि शायद उन्हें कुछ तरस आ जाए।
यह देश के मजनूओं के लिए बहुत ही भारी समय है। मैं उनके लिए चिंतित हूं। मुझे डर है, कहीं देश का मजनूं वर्ग बजट और वित्तमंत्री साहिबा के खिलाफ धरना-प्रदर्शन न शुरू कर दे। बजट में मजनूं वर्ग की उपेक्षा नहीं सहेगा हिंदुस्तान।







