जी के चक्रवर्ती
भारत की जनमानस राजनीति के क्षेत्र में सामाजिक परिवर्तनों के माध्यम से एक अनकहे क्रांति लाने की ओर धीरे-धीरे अग्रसर हो रही है। देश के राजनीतीज्ञ लोगों ने हमारे समाज में फैले मतभेदों का लाभ उठाते हुये अवसरवाद, खुदगर्ज एवं अप्रिय सत्ता का विस्तार कर लिया है, लेकिन अब सामाजिक बदलाव एवं जनमानस में राजनितिक चेतना के विकसित हो जाने से इस क्षेत्र की स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन आना शुरू हो चुका हैं इसके उद्धरण स्वरूप यदि हम अभी हाल ही में दिल्ली में हुये चुनाव के परिणामो को देखे तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अब भारतीय जनमानस कल्याणकारी, खुशहाली एवं विकास की बातें करने वाले राजनीतिज्ञ लोग को ही, अपनी पहली पसंद बनाते चले जा रहे है। विशेषतः हमारे देश के महिलाओं एवं नौजवानों के मध्य पहले की अपेक्षा वर्तमान समय में राजनितिक समझ के विकसित हो जाने से उनके दृष्टिकोण में बहुत बड़ा बदलाव आया है जिसे हम देश में होने वाले चुनावों के परिणामों में स्प्ष्ट रूप से देख सकते है।

चुनाव आयोग के कथनानुसार वर्ष 2004 के आम चुनाव में महिलाओं के मुकाबले 8.4 पुरुषों ने अधिक मतदान किया था। वहीं पर वर्ष 2019 में हुये आम चुनावों में महिलाओं के मतदान प्रतिशत पुरुषों की अपेक्षा अधिक हो गये। यहां यह ध्यान देने योग्य बात है कि हमारे देश को मिली आजादी के पूरे 71 वर्षों के गुजर बाद भी आज हमारा समाज पुरुष प्रधान बना हुआ है, लेकिन अब ऐसा दिखाई देने लगा है कि हमारे देश की आधी आबादी न केवल बहुत तेजी से समाज में फैले इस तरह की दुराग्रह पूर्ण कुंठाओं एवं असमानता की खाई को पाटते हुए आगे बढ़ती हुई दिखायी देने लगी है।
वहीँ पर हम अभी दिल्ली के शाहीन बाग में हो रहे धरना-प्रदर्शनों के मामले में देखें तो उस पर जिस तरह से बहस छिड़ी हुई है उससे उन महिलाओं के मन में यह आशंकायें पहले से ही पैदा होने लगी थी कि यदि राजधानी दिल्ली में अशांति फैली, तो इससे हमारे परिवार के लोग भी खतरे में पड़ सकते है जिसके परिणामस्वरूप वे अभी तक शांति पूर्ण धैर्य बनाये रखेने की परिचय देते हुये लगातार प्रदर्शन कर रही थी लेकिन आखिर कर वही हुआ जिसका डर था। वहीँ पर एक गौर करने वाली बात यह है कि जिस समाज में महिलाओं के लिए आज भी पर्दा प्रथा बादस्तूर जारी है उस समाज की महिलायें उस पर्दे को हटा कर प्रतिकार स्वरूप सार्वजानिक तौर पर समाज के सामने निकलने के लिये मजबूर हुई हैं।

यहाँ यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं सामाजिक सुरक्षा की दृष्टिकोण के मामले में अधिक सतर्क एवं संवेदनशील हैं। आज दिल्ली के शाहीन बाग में हो रहे प्रदर्शन की कमान भी औरतों ने ही संभाल रखा था वहीँ पर हम कह सकते हैं कि यदि यहाँ पर महिलाओं के स्थान पर पुरुष वर्ग के लोग होते तो न जाने कब इस धरना -प्रदर्शन का क्या हस्र हुआ होता? पुलिस उन्हें कब का खदेड़ चुकी होती और यह प्रतिरोध स्वरूप होने वाला प्रदर्शन देश के महिलाओं में विशेषतः मुस्लिम महिलाओं में इतने वर्षों के बाद सोये हुये मानसिक परिवर्तन को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
आज इस समाज की महिलायें उनके समाज के पुरुषों द्वारा पहनाये गये बेड़ियों को तोड़ कर आगे आने लगी है। वैसे आज की महिलाएं हुकूमत बना भी सकती हैं और मिटा भी सकती हैं। पुरुष प्रधान वाले हमारे भारतीय समाज में आये इस तरह का परिवर्तन एक सुखद अहसास करने के साथी ही नये परिवर्तन की बयार बहने की संकेत दे रही है।







