आत्म-ज्ञान का मार्ग
एक साधक था। उसके अंदर आत्मसाक्षात्कार की आकांक्षा थी। वह एक साधु के पास गया और उनके चरणों में विनत इच्छा व्यक्त की। साधु ने उसे एक मंत्र दिया और कहा, “एकान्त में इस मंत्र का एक वर्ष तक जाप करो और फिर मेरे पास नहा-धोकर आओ।” एक वर्ष पूरा होने पर वह साधु के पास आया। साधु ने पहले से ही एक जमादारिन से कह रखा था कि वह जैसे ही आने को हो, उस पर झाडू से गर्दा(कूड़ा) उड़ा दे। जमादारिन ने वैसा ही किया। उसका नहाना-धोना बराबर हो गया।
वह गुस्से से लाल-पीला होकर जमादारिन को मारने को झपटा। जमादारिन भाग गई। वह फिर से नहाधोकर साधु के पास गया। साधु ने कहा, “जरा-सी बात पर तुम आपे से बाहर हो गये और सांप की तरह काटने दौड़े। जाओ, अभी एक साल और मंत्र का जाप करो।” मन मारकर साधक चला गया। एक वर्ष बाद फिर आया। साधु ने इस बार जमादारिन से उसे झाडू छुआ देने को कहा। उसने वैसा ही किया।
इस बार वह उस पर झपटा नहीं, खड़ा-खड़ा कोसता रहा। उसके बाद फिर से स्नान करके साधु के पास गया। साधु ने कहा, “वत्स, तुम सांप की तरह काटने तो नहीं दौड़े, पर फुफकारे बिना नहीं रहे। जाओ, एक साल मंत्र का जाप फिर करो।” साधक की आत्म-ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा इतनी प्रबल थी कि वह पुनः एक वर्ष के लिए साधना करने चला गया। साल बीतने पर आया तो साधु ने जमादारिन से उस पर कूड़े की टोकरी उड़ेल देने को कहा।
जमादारिन ने वैसा ही किया। कूड़ा गिरते ही साधक की आंखें खुल गई। वह समझ गया कि ऐसा साधु ने उसकी परीक्षा लेने के लिए किया है। उसने बड़े शान्त भाव से जमादारिन से कहा, “माता, तूने मेरा बड़ा उपकार किया है। मेरे अंदर के पर्दे को हटा दिया।” इसके पश्चात् वह साधु के पास गया और उसके चरण पकड़ लिये। बोला, “महाराज, मेरे अंदर कूड़ा-करकट भरा था। आपने उसे साफ कर दिया। मैं जन्मजन्मान्तर तक आपका ऋणी रहूंगा।” साधु ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया। बोले, “बेटे, बिना चित्त की निर्मलता के आत्म-ज्ञान नहीं हो सकता। शुद्ध अंतःकरण से ही ब्रह्म के स्वरूप को पहचाना जा सकता है।”







