Viral Issue: जी के चक्रवर्ती
हमारा देश विभिन्न जाती धर्मों के लोगों के संगम वाला एक लोकत्रांतिक देश होने के कारण यहाँ जाति धर्म की बात करके समाज के लोगों को विभक्त करने से इसकी अखण्डता को कमजोर कारना कहाँ तक उचित है यह तो इस तरह की मांग या बात करने वाले लोग ही जाने, लेकिन अब एक बार फिर से देश में इसी वर्ष यानिकि 2020 से शुरू होने वाली जनसंख्या गणना का काम एक अप्रैल 2020 से इसकी प्रक्रिया की शुरूआत होने वाली है।
जनगणना की प्रक्रिया तीन चरणों में सम्पन्न होगी। पहले चरण में यानी की इसी वर्ष एक अप्रैल 2020 लेकर से 30 सितंबर के मध्य केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारीयों द्वारा घर-घर जाकर इसके आंकड़े इकठ्ठा करने का काम करेंगे। जनगणना का दूसरा चरण वर्ष 2021 में 9 फरवरी से 28 फरवरी के मध्य पूरा होगा। जनगणना को अंग्रेज़ी में सेंसस ( Census ) कहते हैं। आज़ाद भारत में सर्व प्रथम जनगणना करने का काम वर्ष 1951 से शुरूआत हुई, इसके बाद से प्रत्येक दस वर्षों के अंतराल पर जनगणना का काम किया जाता रहा है, ऐसे में विभिन्न जातीयों पर आधारित जनगणना की मांग देश में फिर से एक बार इसमें आपत्ती अनापत्ती जैसी मांगों का उठना भी स्वाभाविक है। अभी देश के बिहार राज्य के विधानसभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर वर्त्तमान समय की केंद्रीय सरकार से वर्ष 2021 में देश में होने वाली जनगणना को जातीय आधार पर कराने की मांग रखी गयी है।
इसमें एक आश्चर्य की बात यह है कि इस प्रस्ताव को विधानमंडल के समक्ष रख कर इसे सभी जातीय भेदों को भुला कर बिना विवाद के प्रस्ताव का पास हो जाना वास्तव में एक अचंभे से कम नहीं शायद ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि इसी वर्ष के अंत तक बिहार विधानसभा के चुनाव जो होने वाले हैं। वैसे, देखा जाय तो जातीय जनगणना की मांग हमारे देश में कोई नयी बात नहीं है वल्कि वर्ष 2011 की जनगणना के साथ अलग प्रारूप पर सामाजिक, आर्थिक एवं जातियों पर आधारित जनगणना सम्पन्न हुई थी लेकिन मूल जनगणना के साथ की गई गिनती के आंकडों को उस वक्त केंद्र की सत्ता में रहे मनमोहन सिंह सरकार ने उसे उजागर नही किया।
जाति आधारित जनगणना की मांग करने वाले नेताओं का ऐसा मानना है कि इससे निकलने वाले निष्कर्ष के आंकड़ों के आधार पर जिन जातियों की जितनी संख्या है, उसके आधार पर उनके लिये सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को बनाने के साथ ही सरकारी नौकरियों में भी उन्हें आरक्षण का लाभ देने में सुविधा होगी। एक बात समझ से परे है कि लोगों के समझ में यह क्यों नही आता है कि हमारे समाज में जब तक यह आरक्षण लागू रहेगा और हमारा समाज जब तक विभिन्न जाती -धर्मो में विभाजित रहेगा तब तक हमारे देश से जातीय भेद-भाव कभी समाप्त नहीं हो सकता है।
वह इसलिये क्योंकि आरक्षण का लाभ पाने वाले व्यक्ति की उसके कार्य स्थल से लेकर समाज में जहाँ भी जाता है उसे समाज के दुसरे लोग एक अलग ही नजरिये से देखने जैसी परम्परा विकसित हो गयी हैं और दूसरों को यह कहते सुनते हम आसानी से देख सकते हैं कि अरे यह तो कोटे वाला है इस तरह की कटाक्षपूर्ण बातों के मध्यनजर एक बार पुनः यह साबित होता है कि यदि हमारे नीति-नियंताओं में जरा भी दूरदृष्टि है तो यह हमारे यहाँ का ऐसा मुद्दा है, जिसमें सतह पर तो बहुत सी खूबियां नजर आती हैं लेकिन इसके गर्भ में अनेकों आशंकाएं एवं डरावनी तस्वीरे इसके पीछे छिपी हुई हैं।
देश की हिन्दू बाहुल्य समाज में (हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख) जैसे जातीय संरचना को ब्राह्मणवादी व्यवस्थाओं का दुष्चक्र माना जाता है लेकिन वास्तव में यह व्यवस्था इतना सशक्त है कि इसके तह तक पहुंच पाना बहुत कठिन है। वहीँ पर यदि हम मुस्लिम समाज की बात करें तो उसमें भी सौ से अधिक जातियां होने के बावजूद जनगणना के वक्त इनके पहचान का आधार मात्र धर्म एवं लिंग ही होता है। यह जातिवादी व्यवस्था का कुछ ऐसा दुष्चक्र हमारे समाज में आज भी फैला हुआ है कि प्रत्येक जाति को अपने से छोटी जाति मिल ही जाती है और यह एक चक्र के समान है जहाँ से प्रारम्भ होता है वहीँ पर जाकर खत्म भी होता है। इसलिये जाति एवं धर्म का पारीत्याग कर सर्व-धर्म आचरण करना चाहिये।
गौतम बुद्ध ने भी जो राजसत्ता ईश्वर या भगवान के नाम से चलाई जाती थी, उसे धर्म से पृथक किया। बुद्ध धर्म, जाति और वर्णाश्रित राज व्यवस्था को तोड़कर समग्र भारतीय नागरिक समाज की स्थापना के लिए संम्पूर्ण विश्व में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करते रहे। वहीँ आचार्य चाणक्य ने जन्म और जातिगत श्रेष्ठता का तिलांजलि देते हुए व्यक्तिगत योग्यता को मान्यता दिया था।







