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    चुनौतियाँ शिवराज की

    By March 24, 2020 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री

    मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार के हटने का व्यापक स्वागत हुआ है। यह सरकार पन्द्रह महीने में ही पूरी तरह अलोकप्रिय हो गई थी। तुष्टिकरण संबन्धी निर्णयों के प्रति भी नाराजगी थी। क्योंकि इससे विकास का मुद्दा उपेक्षित हो गया था। अब यही समस्या शिवराज सिंह चौहान के सामने है। कमलनाथ कुशासन की विरासत छोड़ गए है। इसे पुनः पटरी पर लाने की चुनौती है। इसी बीच कोरोना के मुकाबले की सर्वोच्च प्राथमिक चुनौती भी है। शिवराज को इसके अनुरूप सरकारी मशीनरी को पुनः चुस्त दुरुस्त बनाना है। इसके लिये शिवराज शपथ ग्रहण करने के फौरन बाद ही सक्रिय हो गए है। कमलनाथ पन्द्रह महीने तक सरकार बचाने में जुटे रहे। क्योकि उनकी सरकार जन्म के साथ ही आंतरिक कलह से घिर गई थी। यही कलह उनके सत्ता से हटने का कारण बन गई थी। उन्होने कुर्सी को तो महत्व दिया। लेकिन यह समझने का प्रयास नहीं किया कि मध्यप्रदेश के लोग चाहते क्या है। वह जनादेश। स्वभाविक नहीं था। भाजपा को पिछले विधानसभा चुनाव में सर्वाधित वोट मिले था।

    विधानसभा चुनाव परिणाम को लेकर दिलचस्प तथ्य उभर थे। नोटा के प्रयोग से भारत के चुनावी इतिहास में नया अध्याय बना था।मध्यप्रदेश में नोटा ने सत्ता का समीकरण बदल दिया था। नोटा प्रयोग करने वालों में अपवाद छोड़ दें तो ये सभी भाजपा के ही समर्थक थे। भाजपा के अलावा किसी अन्य को वोट देने के विषय में ये सोच भी नहीं सकते थे। तब एससीएसटी एक्ट के चलते नोटा को हवा दी गई थी। ऐसे में नोटा का प्रयोग करने वालों ने कांग्रेस की संजीवनी प्रदान कर दी थी। तब कहा गया कि किसी पार्टी की सरकार का बन जाना चुनाव की अंतिम परिणति होती है। फिर इस बात का कोई व्यवहारिक मतलब नहीं रहता कि हार जीत का अंतर क्या था। फिर भी भविष्य के आकलन में ऐसे आंकड़े उपयोगी साबित होते है।

    मध्यप्रदेश में नोटा कांग्रेस के लिए वरदान साबित हुआ। एससीएसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को निरस्त करने से बड़ी संख्या में लोग नाराज थे। इन्हीं में कुछ लोग नोटा प्रयोग का अभियान चला रहे थे। यह कहना गलत नहीं होगा कि मध्यप्रदेश में नोटा के कारण कांग्रेस को सत्ता नसीब हुई। यहां मुख्यमंत्री पद के लिए शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता सर्वाधिक थी। कांग्रेस के कमलनाथ और ज्योतारदित्य सिंधिया का स्थान उनके बाद था।

     

    कमलनाथ इस दौड़ में बहुत पीछे थे। फिर भी कांग्रेस हाईकमान ने ज्योतिरादित्य की जगह कमलनाथ को कमान सौंपी थी। मध्यप्रदेश की चौदह सीटों पर नोटा ने असर दिखाया। कांग्रेस को ग्यारह सीट नोटा के कारण हासिल हुई। भाजपा को भी तीन सीट ऐसी मिली। लेकिन सच्चाई यह थी कि भाजपा समर्थकों ने ही नोटा का प्रयोग किया था।

     

    वह अपनी ही पार्टी को सबक सिखाना चाहते थे। नोटा की वजह से ही कांग्रेस को सफलता मिली। ये वही वोट थे जो एससीएसटी एक्ट के विरोध में भाजपा को सबक सिखाने की बात कर रहे थे। चौदह सीटों पर हार का अंतर नोटा में पड़े वोट से कम था। इससे पहले कर्नाटक चुनावों में भी नोटा ने आठ सीटों पर भाजपा की जीत को हार में तब्दील कर दिया था। मध्यप्रदेश चुनावों में डेढ़ प्रतिशत लोगों ने नोटा का प्रयोग किया। यह संख्या साढ़े चार लाख से ज्यादा है।मध्यप्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों को इकतालीस प्वाइंट दो प्रतिशत वोट मिले हैं। इनकी नोटा के तहत पांच हजार से ज्यादा संख्या रही,जबकि जीत का अंतर करीब दो हजार था।

    वारासिवनी सीट पर निर्दलीय प्रदीप जायसवाल को पैंतालीस हजार छह सौ बारह वोट मिले थे,जबकि भाजपा के योगेश निर्मल को चवालीस हजार छह सौ तीरसठ वोट मिले। नोटा में एक हजार पैंतालीस वोट पड़े। टीकमगढ़ में नोटा को नौ सौ छियासी वोट पड़े थे, सुवासरा विधानसभा में भाजपा को नवासी हजार सैट सौ बारह , कांग्रेस को नवासी हजार तीन सौ चौसठ और नोटा पर अठ्ठाइस सौ चौहत्तर वोट पड़े थे,गरोथ में नोटा को तेईस सौ इक्यानवे वोट मिले।

    राजनगर में भाजपा के उम्मीदवार को चौतीस हजार आठ सौ सात वोट और कांग्रेस के प्रत्याशी को चौतीस हजार एक सौ उनतालीस वोट पड़े थे, जबकि नोटा के पक्ष में इक्कीस सौ तैतीस वोट पड़े थे, नेपानगर में कांग्रेस को करीब पच्चासी हजार भाजपा को करीब चौरासी हजार और नोटा को करीब पच्चीस सौ वोट पड़े थे,मान्धाता में कांग्रेस को करीब इकहत्तर हजार भाजपा को करीब उनहत्तर हजार और नोटा को पन्द्र सौ पचहत्तर वोट पड़े थे,कोलारस में भाजपा को इकहत्तर हजार एक सौ तिहत्तर और कांग्रेस को सत्तर हजार जबकि नोटा पर करीब साढ़े छह सौ वोट पड़े थे, जोबाट सीट पर नोटा में पांच हजार एक सौ उनतालीस वोट पड़े, जबकि दोनों दलों के प्रत्याशियों की जीत का अंतर पच्चीस सौ था।

     

    जओरा सीट पर नोटा के पक्ष में पन्द्रह सौ वोट पड़े, कांग्रेस सात सौ वोट से जीत गई। मध्यप्रदेश में चौतीस सीट पर तीन सौ वोट के अंतर, छह सीट दस वोट के अंतर और दो सीट मात्र एक वोट के अंतर से पराजय मिली थी। लोकसभा चुनाव में बाद यह स्थिति बदल गई। अनुमान लगाया गया कि नोटा प्रयोग करने वालों ने कमलनाथ सरकार को देखकर अपने रुख में बदलाव किया। लोकसभा में कांग्रेस को भारी पराजय का सामना करना पड़ा था। ऐसे में कहा जा सकता है कि कमलनाथ सरकार पर लोगों का विश्वास नहीं रह गया था। इसमें कोई संदेह नहीं कि मध्य्प्रदेश कांग्रेस में आंतरिक कलह चरम पर था। कांग्रेस हाईकमान को इस पर विचार का समय नहीं था।

     

    ज्योतिरादित्य की नाराजगी जग जाहिर थी। कांग्रेस के विधायक हरदीप सिंह डांग ने विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। यह सरकार और पार्टी दोनों के लिए चेतावनी जैसा था। हरदीप सिंह उन लापता चार विधायकों में से एक बताए जा रहे हैं, जिनके गायब होने की बात सामने आई थी। यह संख्या बढ़ती गई। कांग्रेस के बयानवीर दिग्विजय सिंह भी लकीर पीटते रहे। अपनी पार्टी संभली नहीं। कहा कि भाजपा नेता प्रदेश सरकार को गिराने के लिए कांग्रेस विधायकों को भारी धनराशि देने की पेशकश कर रहे हैं। ऐसे ही आरोप कमलनाथ लगाते रहे।

     

    उंन्होने यहां तक कहा कि अगर मुफ्त में यह पैसा मिल रहा है तो वे इसे ले लें। लेकिन वह अपने विधायकों को रोक नहीं सके। निर्दलीय विधायक प्रदीप जायसवाल ने कहा था कि अगर कमलनाथ सरकार गिर जाती है, तो मेरे विकल्प खुले रहेंगे। मैं अपने विधानसभा क्षेत्र की जनता के हित को ध्यान में रखते हुए फैसला लूंगा। जबकि बसपाऔर सपा के विधायकों ने खरीद फरोख्त और अपहरण के आरोपों से इनकार किया। जाहिर है कि कांग्रेस सरकार बढ़ती अलोकप्रियता व आंतरिक कलह से घिरी थी। इसके लिए किसी अन्य को दोष नहीं दिया जा सकता।

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