राहुल गुप्ता
कलम भी आज बेबस सी नज़र आ रही है, विचार रूँधे हुए से हैं, मन बेचैन है और आत्मा व्याकुल सी है। मानव सभ्यता की स्थापना के बाद से यह पहला ऐसा दौर है जब समूची मानव सभ्यता पूरे भूमंडल में डरी और सहमी हुई सी है। कई दशकों से चला आ रहा विकास का वो औद्योगिक पहिया थम सा गया है, जो प्रकृति के विनाश में कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं अप्रत्यक्ष रूप स कारक जरूर रहा है। प्रकृति जरूर एक तरफ खुद को मानवों द्वारा रोपे गये अत्याचारों से खुद को कुछ मुक्त सा महसूस कर रही होगी। यह पहलू प्रकृति के रिचार्ज होने का भी हो सकता है, क्योंकि हम मानवों द्वारा प्रकृति पर लगातार अत्याचार हो रहा था। अभी कुछ महीने पहले ही आमेजन व आस्ट्रेलिया के जंगलों में भयावह दावानल में करोड़ों जीव-जंतुओं ने अपना जीवन खोया है।
यह दावानल कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष रूप से हम मानवों की ही देन थी। उस रूग्ण दौर में भी कई मानवों की आँखों से आँसू जरूर बहे हैं। इन निरीह जीवों के लिये दुआएं जरूर निकली हैं। लेकिन हम भौतिकता के दौड़ में इस कदर आगे बढ़ते जा रहे थे कि जिससे हमारा जीवन है उस प्रकृति का ख्याल रखना ही छोड़ दिया, खुद को ईश्वर से महान साबित कर लिया। वर्ष 2019 के उत्तरार्ध ने नये साल को जो तोहफा दिया वो पूरे विश्व में एक भयावह स्थिति उत्पन्न कर दी। पूरे विश्व की निगाहें इस भयानक वायरस की जन्मस्थली देश चीन की ओर टिक गयीं। इस महामारी को लेकर तरह-तरह की आशंकाएं भी शुरू हो गयीं। लेकिन कोविड-19 के जन्म या आविष्कार को लेकर कोई किसी निर्णय तक नहीं पहुँचा। कोई इसे चीन द्वारा निर्मित जैविक हथियार बता रहा है तो कोई इसे ड्रग माफिया की काली करतूत!
फिलहाल इसकी परत तो भविष्य की आँधी ही उतारेगी। विश्व के कई देश व खुद चीन भी इसके लिये कई समितियाँ बना जाँच कर रहा है। चीन का दोष तो है ही कि उसने विश्व को इस वायरस के भयंकर संक्रमण के बारे में समय से सचेत नहीं किया। जिसकी वजह से यह विश्वव्यापी हो गया। जाँच के बाद छिपकली, चमगादड़ आदि से फैलने के कारणों में भी विराम लग गया है। अनुसंधान व जाँच अब भी जारी है, इस वायरस की क्रोनोलॉजी समझने के लिये। लेकिन अभी कोई ठोस परिणाम विश्व के समक्ष नहीं है।

चीन का वुहान जब नरक में तब्दील हो रहा था तब शायद ही विश्व के किसी देशों ने भयावहता को रोकने के लिये कोई ठोस तैयारियाँ की हो। कई विकसित देश तो अपनी उम्दा स्वास्थ्य नीतियों के चलते भी दहाड़े मारने लगे हैं, लेकिन भारत जैसे बड़े घनत्व वाले और विकासशील देश में जहाँ स्वास्थ्य सेवाएं उतनी बेहतर नहीं हैं पर इसका धीमा प्रसार तो यहाँ की सरकार को आश्वस्त करता नज़र आया। इस निष्फिकरी की कुंभकर्णी नींद से सरकार मानो यकायक जगी और बिना पूर्व तैयारी के कोविड-19 से लड़ने के लिये मैदान में आ गयी। भारत के प्रधानमंत्री ने कोरोना से प्रभावित कई देशों के लॉकडाउन की स्थितियों के बारे में पता करने के बाद ही जनता को 19 मार्च की रात 8 बजे संबोधित करते हैं और 22 मार्च को जनता कर्फ्यू को सफल बनाने का आह्वान करते हैं। यह जनता कर्फ्यू इतना सफल होता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को भी मोदी जी व भारत की तारीफ करनी पड़ती है।
जनता कर्फ्यू सफल क्या हुआ, सरकारें आश्वस्त हो गयीं कि जनता भूखे पेट भी सहयोग दे देगी। लेकिन जिनके बच्चे भूख से बिलबिला रहे हैं उनके लिये कोई महामारी बड़ी नहीं होती। समय रहते जानकारी बहुत पहले होने के बावजूद सरकार चैन की बंशी बजाती रही, यह भी सरकार की दूरदर्शिता को जाहिर नहीं करता। जनता की सावधानी व गर्म मौसम के कारण अभी यहाँ रेशियो कुछ कम नज़र आ रहा है। लेकिन वक्त और भी बुरा हो सकता है जिस प्रकार से बिना जाँच वगैरह के पलायन जारी है।।
यहाँ कोविड19 की जाँच के लिये लैब भी उचित अनुपात में नहीं हैं, मास्क, ग्लब्स, सैनेटाईजर, पीपीई आदि की कमी से पूरा भारतीय बाजार जूझ रहा है। सरकारी अस्पतालों में भी इन सबकी किल्लत दिख रही है। ऐसे में सरकार को ठोस नीतियों के तहत काम करना पड़ेगा। गरीबों की मदद के लिये कई हाथ भी उठे हैं। सरकार भी मदद कर रही है लेकिन इन सबका पलायन लॉकडाउन के नियमों की धज्जियाँ उड़ाता हुआ, कोविड19 वायरस को भारत में प्रलय मचाने के लिये तत्पर है।
अर्थव्यवस्था का ग्राफ तो निरंतर नीचे गिर ही रहा है। सरकार अब दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखकर नीतियाँ लागू करें, सख्ती बरते। लॉकडाउन से होने वाले ऐसे प्रभाव पहले ही विदेशों में देखे जा चुके हैं जनता सरकार के वश में नहीं थी। लेकिन यहाँ आज मोदी जी ने मन की बात द्वारा जनता से मन की बात कही, जो एक आम नागिरक व बुद्धिजीवी के हिसाब से तो सही है लेकिन विपदा की स्थिति में एक शासक होने के नाते पहले से ही तैयारी करके घोषणाओं को सख्ती से अमल में लाने का कार्य करवाना चाहिए। पलायन करने वाली जनता के बारे में भी पूर्व में सोच लेना चाहिए आपके पास विचारकों व मनोवैज्ञानिकों की कमी नहीं है।

अब स्थिति यह होने जा रही है कि लोगों को अपने घर में आने की फिकर है और हो क्यों न? क्योंकि सब को भय है कि कहीं यह लॉकडाउन कुछ महीनों तक का न हो जाये। सरकार अब आगे की स्थितियों से निपटने के लिये सजग हो अब भी समय है इस महाराक्षस को पावन नवरात्र में ही भारत में अप्रभावी कर दिया जाये। अपनी सरकारी मशीनरी व सभी चिकित्सकों व पैरामेडिकल टीम को सजग रखना चाहिए तथा उन सबका प्रशिक्षण कोरोना के खिलाफ करवाना चाहिए। तथा गाँव-गाँव में आइसोलेशन वार्ड बनाने के साथ लोगों के प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिये डाईट को लेकर लोगों को जागरूक करना चाहिए। आगे आने वाली समस्याओं को भी ध्यान में रखकर नीतियाँ तय करनी होंगी।
जनता के आवश्यक सामानों के लिये कई जगहों पर दो घंटे की बाजार खोलने पर खुद जनता किसी गाइडलाईन का पालन नहीं कर रही। एक मीटर की दूरी का कोई प्रभाव नहीं, ग्लब्स नहीं, मास्क नहीं! खैर ग्लब्स व मास्क तो बाजारों में ही उपलब्ध नहीं लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग तो अपने बस का है। सैकड़ों लोग एकत्रित होते हैं जिससे संक्रमण का प्रलयंकारी खतरा बिलकुल मंडरा रहा है। सरकार ने सहायता के लिये नंबर भी जारी किये हैं किंतु लोग भीड़ के साथ निकलने से बाज नहीं आ रहे। वो खुद के लिये खतरा तो पैदा ही कर रहे हैं साथ ही अपने परिवार के लिये व देश के लिये भी। बार-बार देश के प्रधानमंत्री लोगों से अपील कर रहे हैं कि इसका इलाज सिर्फ और सिर्फ बचाव है, एकांत है।
आज भी कई लोग जारी नम्बर पर अधिकारियों को फोन करने से डरते हैं क्योंकि यह कभी चलन में था ही नहीं। नौकरशाहों से डरना यहाँ के आमलोगों में तो ब्रिटिश हुकूमत से भरा हुआ है। नौकरशाहों को भी यह भय की चादर लोगों के मन से हटानी पड़ेगी उन्हें जागरूक करना पड़ेगा। आगे आने वाली ऐसी आपदाओं पर तुरंत नियंत्रण करने के लिये। पलायन करने वाली जनता व घरों से बाहर निकलकर आवश्यक चीजों के लिये भीड़ एकत्रित करने वाली जनता सरकार द्वारा जारी किये गये नम्बरों को फेस नहीं कर पा रही। इससे भी समस्या विकराल रूप धारण करने को आतुर है। हमें आगे भी आने वाली समस्याओं के लिये सजग रहना होगा तथा आमजन को जागरूक करते हुए शासन-प्रशासन के हेल्पफुल नेचर को उनके बीच व्यवहारिक रूप से चरित्रार्थ करना होगा।






