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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    कोरोना का कहर एक युग परिवर्तन की ओर! पार्ट-1

    By April 28, 2020 Current Issues 2 Comments9 Mins Read
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    • समाजशास्त्री और लेखिका अलका शुक्ला ने बताया कोविड-19 के बाद की स्थितियाँ
    • कोविड-19 और इस जैसी अन्य महामारी तथा जैविक हथियारों से निपटने के लिये दिये नवीनतम विचार और सुझाव
    • भौमंडलीकरण और केंद्रीकरण की अवधारणा में करने पड़ेंगे बड़े परिवर्तन

    इस विपदा के दौर में विश्व में जितने भी दूरदर्शी लोग हैं, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक, लेखक आदि लगभग सभी के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। आमजन भी वर्तमान में परेशान जरूर है और भविष्य को लेकर शायद खुद चिंतित भी। लेकिन मन में वो तसल्ली जरूर कर लेता होगा कि काम तो छूट गया है फिर नये काम की तलाश में थोड़े संघर्ष के बाद काम मिल ही जायेगा, या सरकार कुछ न कुछ तो करेगी ही। बस उसे अपने परिवार व रोजगार की चिंता है और यह चिंता वाजिब ही है। सरकार को तथा बड़े-बड़े विचारकों को अब नये तरीके से सोचने की जरूरत है।

    इस विषय में सीनियर कॉपी एडीटर राहुल कुमार ने कुछ चिंतनशील लोगों से ऑनलाईन विचार और सुझाव साझा किया, तथा कुछ आम जनमानस से भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए व्यक्तिगत रूप से इस विषय से संबंधित विचार और सुझाव साझा किया। पहले क्रम में कई सुझाव और विचार समाजशास्त्री व लेखिका अलका शुक्ला के हैं। इन सुझावों व नवीनतम विचारों के लिये हम उनके आभारी हैं। इन विचारों व सुझावों को अब अमल में लाने का वक्त है। अगर आमजनमानस और सरकारें चेतती हैं तो यह एक युग परिवर्तन का भी वक्त हो सकता है तथा मानव सभ्यता को एक दीर्घकाल तक बचाने में सहायक हो सकता है।

    कुछ अनावश्यक भौतिक सुविधाओं के लिये भी अंधाधुंध प्रकृति के विनाश में संलग्न रहने वाली मानव जाति के प्रगति का रथ एकाएक रुक सा गया है। कोविड-19 के जनक देश समेत विश्व के सभी देशों ने शुरुआती तौर पर इस वायरस को बहुत हल्के में लिया, देर से सही लेकिन चीन को इस वायरस की आक्रमकता के बारे में जब जानकारी हो चली थी तब भी चीन ने विश्व के साथ सहयोग नहीं किया। उसे इस खतरनाक वायरस के बारे में सही समय से चेताया नहीं। सभी देशों की जाँच एजेंसियाँ भी चीन से इसकी सही जानकारी सही समय में निकाल पाने में नाकाम रहीं। इसीलिये विश्व के लगभग समस्त देश आश्वस्त थे कि ये तो चीन का मामला है।

    सन् 2003 में आये सॉर्स वायरस की तरह इसकी भी पहुँच चीन तक या कुछ आस पास के देशों तक संभव रहेगी और जल्द ही इसे काबू में किया जा सकता है। इसी मानवीय महानता व अति विश्वास के चलते इस अदृश्य महाशत्रु की ताकत का पता लगाने के बारे में शुरुआती दौर पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। कुछ आरोप भी चीन पर लग रहे हैं कि यह वायरस उसी ने ईजाद किया है, इसके लिये कई देशों की जाँच एजेंसियाँ युद्ध् स्तर पर यह खोजने के प्रयास में लगी हैं। यह जो दौर है ग्लोबलाईजेशन का है, इस समय तो विश्व जैसे एक मुट्ठी में समाया हुआ सा प्रतीत होता है। इसी ग्लोबलाईजेशन की वजह से भी विश्व में इस घातांकी महासंक्रमण का तेजी से प्रसार हुआ है। अगर ग्लोबलाईजेशन न होता तो आर्थिक प्रतिद्वंद्विता भले कम रहती लेकिन मानव जाति पर हो रहा यह अत्यंत दुःखद पल विश्व न झेल रहा होता। कई वैज्ञानिक तो यह बता रहे हैं कि यह सालों पहले खोजे गये साधारण फ्लू के वायरस कोरोना के परिवार का नया सदस्य है जो उत्परिवर्तन के कारण तैयार हुआ है। इसी साधारण फ्लू के कारण व इस जैसे लक्षण होने के कारण भी चीन समेत कई देश शुरुआती दौर पर ढीले रहे। जब दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचने में यह वायरस सफल रहा तब बहुत सी जानकारियाँ इस वायरस के विषय में मानव समुदाय को अनुभव के कारण मिलती रहीं। जिसके कारण विश्व में नये प्रकार के शब्द आम जनमानस को रट से गये। मीडिया के दिन और रात अब इन्हीं शब्दों के बीच कटता नज़र आता है। क्वारंटीन, लॉकडाउन, सोशल डिस्टेंसिंग, आईसोलेशन, सेल्फ आईसोलेटेड आदि..शब्द! बचाव के लिये मास्क, सैनेटाईजर, ग्लब्स, हाथों का बार-बार धोना, उन्हें चेहरे पर ले जाने से बचना, इम्यून सिस्टम को मजबूत करने पर जोर देना आदि कोविड-19 से बचने के उपाय जब विश्व ने ईजाद कर लिये थे तब जाकर इस वायरस ने भारत में दस्तक दी। दुनिया ने काफी बलिदान देने के बाद बचाव के इतने कारक तैयार किये थे।

    यह भारत जैसे विकासशील देश व अति जनसंख्यक देश का अन्य देशों की अपेक्षा तो सौभाग्य ही था कि इस महाशत्रु के खिलाफ सरकार ने जनता को बचाव के लिये बचाव के कारक (गाईडलाईन) दिये। लेकिन भारत सरकार भी अन्य देशों की सरकारों की तरह निष्फिकिर थी जिसके कारण शुरुआती दौर पर यहाँ की सरकार व अन्य से लापरवाहियाँ भी हुईं। फिर सरकार ने लॉकडाउन व सोशल डिस्टेंसिंग समेत गाईडलाईन भी जारी कर दी। भारतीय जनता क्या ये विश्व के किसी भी देश की जनता के साथ बिल्कुल नया सा था, जनता कर्फ्यू के दौरान भारत की जनता ने अपनी सरकार को यह विश्वास दिलाया कि वो कोरोना के खिलाफ जंग लड़ने को तैयार है। लेकिन सरकार को अगर पहले से लॉकडाउन के बाद होने वाली समस्याओं का सही से आंकलन हो जाता तो शायद ही यहाँ हजार से ऊपर कोई कोरोना का केस जा पाता। क्योंकि यहाँ का मौसम साधारण फ्लू के वायरस या किसी अन्य फ्लू के वायरस के लिये बहुत अनुकूल नहीं है। जबकि अन्य ठंडे प्रदेशों में जो कोविड-19 का संक्रमण तेजी से फैला है, जिसमें वहाँ का मौसम भी कारक है। भारत के ग्रामीणों व मजदूरों का (गरीबों का नहीं) इम्यून सिस्टम भी अच्छा है। इस वजह से यहाँ इस महामारी के संक्रमण के फैलने की दर उतनी ज्यादा नहीं है। लेकिन सभी विरोधी दल सरकार पर यह आरोप भी लगा रहे हैं कि टेस्ट कम हो रहे हैं इसलिये भारत में मरीजों की संख्या कम नज़र आ रही है और यह सरकार की लापरवाही को दर्शाता है। यह कुछ हद तक सत्य भी हो सकता है कि टेस्ट कम हो रहे हों, लेकिन ज्यादातर पॉजिटिव केस यहाँ ठीक भी हुए हैं। लेकिन समस्या यह है कि लॉकडाउन के बाद संक्रमण के केसों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। यह भारत के लिये जरूर चिंतनीय है। अब सरकार को चिकित्सकीय व्यवस्थाओं की ओर और अधिक ध्यान देना पड़ेगा और भारत में जितने भी रैपिड टेस्ट निगेटिव आये हैं उनकी रि-टेस्टिंग RT-PCR से होनी चाहिए। क्योंकि निगेटिव आने वाले में कोविड-19 का प्रभाव होने के बावजूद जाँच में पता नहीं चल पाता।

    यहाँ की चिकित्सकीय व्यवस्था भी बड़े उद्योगों जैसी है जैसे कोई बड़े उद्योग एक ही महानगर के पास एकत्रित हो जाते हैं उसी प्रकार अच्छे अस्पताल व चिकित्सक भी इन्हीं महानगरों में व इनके आसपास ही मिलते हैं। जिसका खामियाजा आज इस कोरोना वायरस के कारण देखने को मिल रहा है। ईश्वर न करे, यदि कहीं इस वायरस ने खुद को और जेनरेट कर लिया या कोई और वायरस, बैक्टीरिया या अन्य सूक्ष्म जीव खुद को मजबूत कर इंसानों पर ऐसा ही आक्रमण कर दिया तो ऐसी अव्यवस्थाओं के कारण हालात बड़े भयानक होंगे। अब सरकार को चिकित्सकीय व्यवस्था को दुरुस्त करने के साथ एक ही शहर में अच्छे अस्पतालों के जमावड़े की ओर ध्यान देना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश में ही अधिकांश गाँव, कस्बे व शहर में सरकारी अस्पताल तो मिल सकते हैं लेकिन बड़े अस्पतालों की सुविधा तो 200-300 किमी. के अंतराल में ही मिल पाती है। इन्हीं कमी के चलते कई गंभीर रोगी रास्ते में दम तोड़ देते हैं। शायद सरकारें इस तरफ अब ध्यान दें तो आमजन को आने वाले कल में बड़ी राहत भी मिल सकती है। कोविड-19 का संक्रमण जरूर अतितीव्र है लेकिन मरने वालों की संख्या प्रतिशत में बहुत ही कम हैं। जिनका प्रतिरक्षातंत्र मजबूत है वो तो इसके चक्रव्यूह से निकलने में कामयाब हो रहे हैं।

    लेकिन दुर्घटनाओं व गंभीर बीमारियों से मरने वालों की संख्या जरूर इससे बहुत अधिक रही। अगर अब सरकार को आने वाले ऐसे सूक्ष्म जीवों के महासंक्रमण से बचना है या किसी जैविक युद्ध से बचना है तो उसे स्वास्थ्य नीतियों में बहुत से परिवर्तन करने पड़ेंगे। अच्छे अस्पतालों व डॉक्टरों के केंद्रीकरण को ब्लाक पंचायत स्तर तक को जरूर विकसित करने होंगे। अब मेडिकल कॉलेज में सीटों की संख्या काफी बढ़ानी होगी। यह भी ध्यान देना होगा कि हर तरह के लोग महानगरों की ओर पलायन जिन सुविधाओं के लिये पलायन कर रहे हैं। वो सुविधाएं हम खण्ड पंचायत में न सही लेकिन जिला स्तर में तो बना ही सकते हैं। हमें बड़े उद्योगों का, कुछ फैक्ट्रियों का, अच्छी शिक्षा व उच्च शिक्षा का व अच्छे अस्पतालों आदि का विकेंद्रीकरण जरूर करना होगा। और भी कई सुविधाओं को जैसे मल्टीप्लेक्स, मॉल, सिनेमा हाल, स्विमिंग पुल, अच्छे पार्कों आदि का निर्माण कार्य भी जिला स्तर पर करवाना होगा, जिससे उच्च शिक्षित लोगों का भी मोह महानगरों की ओर से कम हो जाये। जिसके और भी कई अन्य परोक्ष लाभ होंगे।

     

    महामारी के बाद विश्व के हालात किसी विश्वयुद्ध के परिणामों जैसे ही खतरनाक होते हैं। देशों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ टूट जाती है। विषमता की खाई बढ़ती ही चली जाती है, गरीबी का आकार बढ़ता है और अमीरी केवल पहले से रहे अमीरों की जागीर बन कर रह जाती है। महामारी के बाद कालाबाजारी, जमाखोरी, ठगी व अन्य कई ऐसी अव्यवस्थाएं बढ़ती जाती हैं जो मानवीय अधिकारों के हनन को ही बढ़ावा देती हैं। यह महाविषाणु तो मरेगा नहीं, दवा या वैक्सीन बनने के बाद भले ही यह निष्क्रिय हो जाये लेकिन अन्य रोगों की तरह यह भी प्रथ्वी में चलन में हो गया है। जो कि आगे भी लोगों को परेशान करता दिखेगा। क्योंकि इसके संक्रमण की दर कम नहीं होगी। भले वैक्सीन लेने के बाद लोग ठीक होते रहें। लेकिन साधारण फ्लू व इस फ्लू में बहुत अंतर न होने के कारण लोग अब साधारण फ्लू से भी सदा भयभीत रहेंगे। इसके चलते दुनिया अब नये तरीके से सोचना शुरू करेगी, अगर नहीं तो मानव सभ्यता का विनाश कब हो जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। जैविक हथियारों के बनने पर पूर्णतः और सख्त पाबंदी होनी चाहिए, इसके लिये राष्ट्रसंघ को और भी बहुत से परिवर्तन करने होंगे।

    जारी…….

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    2 Comments

    1. Dr.Pawan on June 2, 2021 12:52 pm

      Wonderful

      Reply
    2. Dr.Pawan on June 2, 2021 12:52 pm

      Excellent

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