अंशुमाली रस्तोगी
मैं ‘पॉजिटिव’ लोगों’ और ‘पॉजिटिविटी’ से इन दिनों दूर-दूर रहने लगा हूं। गाहे-बगाहे अगर कोई मुझे ‘पॉजिटिव’ बता दे तो डर-सा जाता हूं। तुरंत भड़क जाता हूं उस पर। आजकल पॉजिटिव होना या मिलना बड़ी भारी समस्या बन गई है।
देश में हवा ही कुछ ऐसी चल पड़ी है कि हर पॉजिटिव ‘बीमार’ नजर आने लगा है। न पॉजिटिव छींक सकते हैं, न खांस सकते। हांफ तो बिल्कुल भी नहीं सकते। ऐसा कोई भी पॉजिटिव लक्षण अगर आपमें पाया जाता है तो खुदा मालिक।
इसीलिए किया यह है कि मैंने जी-भरकर खुद पर निगेटिविटी ओढ़ ली है। निगेटिव लोगों से मिलता हूं। निगेटिव लोगों से बात करता हूं। निगेटिव ही पढ़ता व लिखता हूं। यहां तक कि मैंने अपना इम्यून सिस्टम भी निगेटिव बना लिया है।
इधर मैंने डटकर निगेटिव कविताएं और व्यंग्य पढ़े हैं। लिख भी इन दिनों निगेटिव ही रहा हूं। छप भी निगेटिव रहा हूं। प्रतिक्रियाएं भी निगेटिव पा रहा हूं। गालियां खाना चूंकि मेरा शौक रहा है तो अपने लिखे पर उन्हें भी पा रहा हूं।
निगेटिविटी में मुझे सुख मिलता है। इसीलिए मैंने ‘आनंद’ फ़िल्म न देखकर ‘वीरप्पन’ देखी। उसे देखने के बाद मैं खुद को कोस रहा हूं कि हाय! मैं उस जैसा क्यों न हुआ! लेखक न बनकर वीरप्पन ही हो जाता तो नाम ज्यादा पाता।
क्या करूं, मुझे सड़क पर चलता हर बंदा पॉज़िटिव नजर आता है। मास्क चढ़ाए रहता हूं। नाक को जरा-सी भी परमिशन नहीं देता पॉसिटिव होने की। निगेटिव बने रहने के लिए मैं कभी-कभार बीवी से भी झगड़ लेता हूं। बात बढ़ते-बढ़ते तलाक तक पहुंच जाती है। लेकिन मजा आता है।
मुझे मालूम नहीं था कि निगेटिव बने रहने में पॉजिटिव बने रहने से अधिक सुख है! बेवकूफ हैं वे लोग जो नोगेटिविटी को छोड़ने की बात करते हैं। कुछ नहीं रखा है पॉजिटिविटी में। बवाल-ए-जान है।
मैं फिर कह रहा हूं, पॉज़िटिव लोगों से बचकर रहिए। नहीं रहेंगे तो ये बर्बाद कर देंगे। निगेटिव लोगों का साथ पकड़िए। न मन में न घर में कभी ‘अशांति’ आएगी ही नहीं।







