पढे लिखे आगे बढ़े, रचे नई तस्वीर,
बेटी को लेकर हुआ, हर समाज गंभीर |1|
जिस समाज मे बेटियाँ, पलें बिना दुर्भाव,
बहुएँ उसी समाज को, मिलती उच्च स्वभाव |2|
बेटी को लेकर चले सामाजिक अभियान,
हत्यारे जो भ्रूण के, वह सबसे शैतान |3|
बेटी बची तो कल बचा, बढा सकल परिवार,
मानवता फूली – फली, पुष्पित हुआ विचार |4|
बेटी जग की मूल है, हर घर की मुस्कान,
बेटी जब फूले – फले, हो प्रसन्न भगवान |5|
बेटी ही माँ – बहन है, बेटी देवी रूप,
बेटी ही रचती यहाँ, सभ्य समाज स्वरूप |6\
बेटी दो- दो कुलों का, रचती सुन्दर रूप,
हर – घर उजियारा करे, जैसे उगती धूप |7|
– अरविन्द कुमार ‘साहू’







